वाराणसी ने भरा था मनु में वीरांगना का जज्बा, बचपन में पिता के साथ देखती थीं मराठों का युद्धाभ्यास

लक्ष्मीबाई का जन्म काशी में मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। काशी के धार्मिक महत्व के कारण पेशवाओं को यहां से काफी लगाव था। वे अक्सर यहां आते रहते थे। अपने बनारस प्रवास के दौरान वे गंगा उस पार रेती में घुड़सवारी और तलवारबाजी का अभ्यास भी किया करते थे।

Saurabh ChakravartyFri, 18 Jun 2021 08:10 AM (IST)
बनारस के अस्सी-भदैनी इलाके में पैदा हुईं लक्ष्मीबाई

वाराणसी, जेएनएन। काशी में जन्मीं मणिकर्णिका को नहीं पता था कि पिता के साथ गंगा उस पार जिन मराठों की घुड़सवारी और तलवारबाजी देखने वह जाती हैं, वही लडऩे की कला उनको इतिहास में अमर बना देगी। बनारस के अस्सी-भदैनी इलाके में पैदा हुईं लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के अन्याय के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया था और उनका मुकाबला करते-करते शहीद हो गई थीं।

भदैनी-अस्सी में रहता था मनु का परिवार : जागृति फाउंडेशन के महासचिव रामयश मिश्र बताते हैं कि लक्ष्मीबाई (जन्म : 19 नवंबर, 1835, निधन : 18 जून, 1858) का जन्म काशी में मराठी कराड़े ब्राह्मण परिवार में हुआ था। काशी के धार्मिक महत्व के कारण पेशवाओं को यहां से काफी लगाव था। वे अक्सर यहां आते रहते थे। अपने बनारस प्रवास के दौरान वे गंगा उस पार रेती में घुड़सवारी और तलवारबाजी का अभ्यास भी किया करते थे। अस्सी-भदैनी में पेशवा का किला भी था। इसी इलाके में उनका परिवार रहता था। रानी लक्ष्मीबाई अपने पिता के साथ गंगा के उस पार जाती थीं और मराठों का युद्धाभ्यास देखती थीं।

पिता अपने साथ मनु को बाजीराव के दरबार में ले गए : भदैनी क्षेत्र में मोरोपंत तांबे की पत्नी भागीरथी बाई ने एक पुत्री को जन्म दिया। पुत्री का नाम मणिकर्णिका रखा गया। प्यार से सब उसे मनु बुलाते थे। मनु जब चार-पांच वर्ष की थीं तभी उनकी मां का देहांत हो गया। पिता मोरोपंत मराठा पेशवा बाजीराव की सेवा में थे। चूंकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था। इसलिए कुछ साल बाद ही वे मनु को बाजीराव के दरबार में ले गए, जहां मनु ने सबका मन मोह लिया। बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा लेने के दौरान लोग उन्हेंंं प्यार से छबीली के नाम से भी पुकारने लगे। बाद में उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ और वह झांसी की रानी बनीं और उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया।

वीरांगना की गाथा बता रहीं जन्मस्थली की दीवारें : जन्मस्थली भदैनी की दीवारों पर बनी कलाकृतियों में उनके जन्म से लेकर शहीद होने तक के जीवन चक्र को उकेरा गया है। इसमें नाना साहब संग प्रशिक्षण लेना, घुड़सवारी, अंग्रेजों से लड़ाई सहित कई प्रसंग दर्शाए गए हैैं।

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