UP विधानसभा 2022 : विधान सभा चुनाव की तैयारी के पहले समाजवादी पार्टी संगठन की सर्जरी

विधान परिषद निर्वाचन से समाजवादी पार्टी में हुए नई ऊर्जा के संचार पर जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में मिली हार प्राणघातक प्रहार से कम न थी। दावे के अनुसार भरपूर सदस्य संख्या के बाद भी प्रत्याशी बिना लडऩा तो दूर चुनाव मैदान की धूल तक सिर माथे न लगा पाई।

Abhishek SharmaTue, 20 Jul 2021 12:14 PM (IST)
नई ऊर्जा के संचार पर जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में मिली हार प्राणघातक प्रहार से कम न थी।

वाराणसी [प्रमोद यादव]। विधान परिषद (स्नातक व शिक्षक) निर्वाचन से समाजवादी पार्टी में हुए नई ऊर्जा केसंचार पर जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में मिली हार प्राणघातक प्रहार से कम न थी। दावे के अनुसार भरपूर सदस्य संख्या के बाद भी प्रत्याशी बिना लडऩा तो दूर चुनाव मैदान की धूल तक सिर माथे न लगा पाई। इसे पार्टी के चुनावी रणनीतिकारों व संगठन ने तब भले ही छोटी सी भूल कह कर किनारा कसने की पूरी कोशिश की हो लेकिन इसे स्थानीय नेताओं -कार्यकर्ताओं ने पार्टी की प्रतिष्ठा धूल में मिलना माना।

चट्टी-चौराहों से बैठकों में इसकी टीस सामने आई तो हर मंच से ताना देकर खुद को दिलासा जरूर दिया, लेकिन राष्ट्रीय व प्रदेश संगठन ने इसे दिल पर ले लिया है। यह जख्म कैसे भरेगा इसके जतन तो नेतृत्व बाद में करेगा, लेकिन पार्टी के शूल निकालने के लिए सर्जरी की पूरी तैयारी कर ली गई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से इस तरह के संकेत से कुर्सी हिलते देख पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों और तथाकथित रणनीतिकारों ने लखनऊ में डेरा डाल दिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार सदन चलने के कारण राष्ट्रीय अध्यक्ष के दिल्ली में होने से अध्यक्ष-महासचिव पीछे-पीछे वहां तक भी हो आए, लेकिन मुलाकात तो दूर की बात जोड़-जतन करने के बाद भी दुआ-सलाम तक का इंतजाम नहीं हो पाया है।

दरअसल, वाराणसी जैसी प्रतिष्ठित सीट पर सदस्यों की बड़ी संख्या जीत कर सामने आने से पार्टी नेतृत्व के उत्साह का पारावार न था। इसे लेकर पदाधिकारियों की पीठ भी एडवांस में थपथपा दी गई थी, लेकिन ऐन मौके पर पर्चा खारिज होने से भी कहीं अधिक इसके कारण ने शीर्ष नेताओं के पैरों तले से जमीन ही खिसका दी। माना जा रहा है कि इसके कारण की तलाश में प्राथमिक तौर पर ही चूक और भूल से भी कहीं आगे की बात सामने आई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि चुनाव के दौरान किनारे रखे गए पार्टी के अनुभवी पदाधिकारियों व जिला पंचायत के पुराने लड़वैयों ने भी बड़े दरबार से आई काल पर इस आगे की बात पर ही मुहर लगाई है। इसमें नामांकन के दौरान आगे रहे तथाकथित एकल रणनीतिकार की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैैं। प्रतिष्ठापरक चुनाव के दौरान वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार रखे जाने से भी संदेह को पुख्ता मानते हुए पार्टी नेतृत्व अधिक सकते में है। ऐसे में सिर्फ एक-दो पदाधिकारियों पर कार्रवाई की खानापूर्ति के बजाय सर्जरी कर दूर तक संदेश देने की तैयारी है। उद्देश्य यह है कि रणनीतिक रूप से मजबूत प्रतिद्वंद्वी के सामने फिर मुंह की खाने की स्थिति न आए। कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव को देखते हुए कुछ अधिक ही एहतियात बरती जा रही है।

कार्रवाई में विलंब से भी सियासी गलियारों में इस तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैैं। कारण यह कि प्रदेश के अन्य जिलों में पर्चा खारिजा या न भरे पा जाने की स्थिति में तत्काल कार्रवाई कर दी गई थी। हालांकि बनारस ही नहीं पूरा पूर्वांचल कभी सपा के लिए सत्ता की सीढ़ी हुआ करता था, ऐसे में बनारस के आसपास के जिलों में भी सर्जरी से पहले सभी स्तरों पर 'पैथालाजिकल' जांच की जा रही है ताकि सर्जरी के बाद भी आगे इस तरह की चूक का रोग न पनप सके। दरअसल, वाराणसी में प्रत्याशी मैदान में इंट्री से रह गया तो भदोही में प्रस्तावक ही निकल लिए। वहीं चंदौली में सदस्य संख्या होने के बाद भी पार्टी को सिर्फ चार वोट मिले तो गाजीपुर में भी ऐन मौके पर वोट इधर-उधर हो गए। वहीं आजमगढ़ जिले में सपा के तीनों ध्रुवों के एक साथ आने से ही जिला पंचायत की कुर्सी पर सपा का कब्‍जा हो सका है। ऐसे में पार्टी में एकता बनाए रखने के तौर पर इसे पार्टी नजीर भी मान सकती है। 

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