BHU : इतिहास लेखन में है भारतीय दृष्टिकोण की कमी, बीएचयू में आयोजित संगोष्‍ठी में बोलीं प्रो. अरुणा सिन्हा

भारतीय इतिहास को पश्चिम केंद्रित दृष्टिकोण से देखा जाने लगा और इसमें भारतीय दृष्टिकोण की कमी महसूस होती है। ऐसे में शिक्षाविदों को चाहिए कि वे वस्तुनिष्ठता एवं निष्पक्षता के साथ भारतीय इतिहास के बारे में सत्य एवं तथ्याें को सामने रखें।

Saurabh ChakravartyMon, 13 Sep 2021 07:32 PM (IST)
प्रो. अरुणा सिन्हा दो दिवसीय संगोष्टी में पहले दिन सोमवार को बतौर विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल हुईं।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। अभी तक का भारतीय इतिहास लेखन "ट्रैप्ड स्टोरी राइटिंग" का शिकार हो गया है। इसका मतलब यह है कि 16वीं शताब्दी में यूरोपीय कंपनियों के आगमन के बाद भारतीय इतिहास को पश्चिम केंद्रित दृष्टिकोण से देखा जाने लगा और इसमें भारतीय दृष्टिकोण की कमी महसूस होती है। ऐसे में शिक्षाविदों को चाहिए कि वे वस्तुनिष्ठता एवं निष्पक्षता के साथ भारतीय इतिहास के बारे में सत्य एवं तथ्याें को सामने रखें। यह कहना है इतिहास विभाग बीएचयू की एमरिटस प्रोफेसर डा. अरुणा सिन्हा का।

डा. सिन्हा काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विज्ञान संकुल में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की ओर से आयोजित दो दिवसीय संगोष्टी में पहले दिन सोमवार को बतौर विशिष्ट अतिथि बोल रहीं थीं। इस संगोष्ठी का विषय ‘‘साम्राज्यवाद का सांस्कृतिक आयाम: भारतीय प्रतिरोध (1498-1757)‘‘ है। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहासविद प्रो. अशोक कुमार सिंह ने इस्लामी साम्राज्यवाद की सारगर्भित व्याख्या की। उन्होंने भारतीय संदर्भ में इस्लामिक साम्राज्यवाद को तीन चरणों में विभाजित करते हुए उसके विरोध में उस दौर में लगातार हो रहे भारतीय प्रतिरोध पर प्रकाश डाला। बताया कि सिंध, कन्नौज, दिल्ली, कश्मीर, मेवाड़, मारवाड़ आदि के हिंदू शासकों ने इन आक्रमणकारियों का सतत प्रतिरोध किया।

हमारे इतिहास को गलत प्रस्तुत किया गया

जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक डा. आशुतोष भटनागर ने 1857 की क्रांति का उदाहरण देते हुए इस तथ्य की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट कराया कि किस तरह से हमारे प्रतिरोध के इतिहास को गलत एवं अन्यायपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया हैं। विशेष आमंत्रित विद्वान डा. बालमुकुंद पांडेय ने अमृत महोत्सव के अर्थ को स्पष्ट किया। कहा कि भारतीय प्रतिरोध का विस्तार समाज की सभी धाराओं राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में विद्यमान था। लेकिन इतिहास लेखन के पक्षपाती दृष्टिकोण में इस तथ्य को इतिहास के पन्नों से दूर रखा गया। बताया कि तुर्क, मंगोल या यूरोपीय घुसपैठियाें का उद्देश्य केवल व्यापार ही नहीं था बल्कि भारतीय समाज एवं संस्कृति पर अपना आधिपत्य स्थापित करना था।

भारतीय इतिहास में अभी बहुत कुछ लिखना बाकी

मुख्य वक्ता व अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ला ने प्लासी की घटना (1757) के उदाहरण द्वारा इतिहास लेखन की विकृतियों की ओर लोगाों का ध्यान आकृष्ट कराया। कहा कि भारतीय इतिहास के ऐसे अनेक बिन्दू हैं जिनपर अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है। साथ ही इतिहास शिक्षकों एवं शोधार्थियों को इस दिशा में काम करने की जरूरत है। कार्यक्रम को कार्यवाहक कुलपति प्रो. वीके शुक्ला, प्रो. केसीआर रेड्डी, प्रो. कुमार रत्नम आदि ने संबोधित किया। कार्यक्रम संयोजन इतिहास विभाग की डा. जयलक्ष्मी कौल, डा. विनोद कुमार, धन्यवाद ज्ञान डा. अमित उपाध्याय ने दिया।

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