ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्‍वनाथ मंदिर मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका खारिज

सुनवायी के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका सोमवार को खारिज कर दी गई। सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) आशुतोष तिवारी की अदालत में प्रार्थना पत्र देकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वादमित्र के रुप में पक्षकार बनाने की पूर्व में अपील की थी।

Abhishek sharmaMon, 08 Mar 2021 04:54 PM (IST)
सुनवायी के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका सोमवार को खारिज कर दी गई।

वाराणसी, जेएनएन। ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्‍वनाथ मंदिर मामले में सुनवायी के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका सोमवार को खारिज कर दी गई। सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) आशुतोष तिवारी की अदालत में प्रार्थना पत्र देकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वादमित्र के रुप में पक्षकार बनाने की पूर्व में अपील की थी।

इससे पूर्व स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से अधिवक्ता चंद्रशेखर सेठ ने दलील दी थी कि प्रतिनिधित्व वाद में कोई भी व्‍यक्ति पक्षकार बन सकता है। वादी (देवता) पक्ष का बेहतर प्रतिनिधित्व हो और भक्तों को जल्द पूजा-पाठ का अधिकार मिले। इसी नीयत से वादमित्र के तौर पर पक्षकार बनाने के लिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से प्रार्थना पत्र अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। रामजन्मभूमि मुकदमा मामले में भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पक्षकार थे और अदालत में उनकी ओर से कई महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे।

इसी मामले में सोमवार को अदालत में सुनवायी के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका को वादमित्र के रूप में पक्षकार बनाने की अपील को खारिज कर दिया गया।  अदालत ने अपने आदेश में सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिनिधित्व वाद में पक्षकारों द्वारा दी गई गवाहों की सूची से वह बाध्य नहीं है। अदालत को यह अधिकार है कि स्वयं भी जरूरत होने पर अलग से भी ऐसे व्यक्ति को साक्ष्य देने के लिए तलब कर सकती है।किसी व्यक्ति को पक्षकार बनाने की आवश्यकता नहीं है।अदालत ने कहा कि वाद काफी पुराना है और प्रार्थना पत्र काफी देर से दिया गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के प्रार्थना पत्र में यह नहीं लिखा गया है कि वादी पक्ष अथवा वाद मित्र द्वारा शिथिलता बरती जा रही है जिससे वाद को सुचारु रुप से नहीं चलाया जा रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वर्तमान वाद में आवश्यक व जरुरी पक्षकार नहीं हैं। वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी द्वारा वादी संख्या एक (प्राचीन मूर्ति देवता स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर नाथ) के हित रक्षण व वाद चलाने में किसी तरह की खामी नहीं पाई जाती है।अदालत ने सुनवाई के लिए अगली तारीख 15 मार्च नियत की है।

बता दें कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जीत नारायण सिंह व चंद्रशेखर सेठ ने ज्ञानवापी परिक्षेत्र का कथित विवादित स्थल मंदिर का भाग है। इससे संबंधित तमाम साक्ष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पास उपलब्ध है जिसे वह अदालत में दाखिल करना चाहते हैं। इस बात को लेकर वादमित्र बनाने की याचिका दाखिल की थी।अदालत में उन्होंने दलील दी कि अदालत प्रतिनिधित्व वाद में किसी भी अतिरिक्त व्यक्ति को वादमित्र नियुक्त कर सकती है।वादी (देवता) पक्ष का बेहतर प्रतिनिधित्व और वाद के निस्तारण में सहयोग करने की भावना से वादमित्र के तौर पर पक्षकार बनने के लिए उनकी ओर से प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया है। रामजन्म भूमि मुकदमे में भी अदालत द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को गवाह के तौर पर पक्षकार मानते हुए पक्ष रखने के लिए बुलाया गया था। उन्होंने बहुत से महत्वपूर्ण साक्ष्य भी प्रस्तुत किये थे।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका पर वादी प्राचीन मूर्ति स्वयंभू देवता ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेवरनाथ की ओर से पैरवी कर रहे वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड व अंजुमन इंतजामिया मसाजिद की ओर से आपत्ति की गई। विजय शंकर रस्तोगी की ओर से दलील दी गई कि उक्त प्रतिनिधित्व वाद में देवता का प्रतिनिधित्व एक ही व्यक्ति कर सकता है। जन प्रतिनिधित्व वाद में वाद पंजीकृत होने तथा किसी को भी पक्षकार बनने के लिए अदालत द्वारा प्रकाशन के जरिए नियत तिथि के पश्चात कोई पक्षकार नहीं बन सकता है। वर्ष 1991 में 15 अक्टूबर को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में उक्त वाद दाखिल होने के पश्चात समाचार पत्रों में नोटिस प्रकाशन कराकर आम लोगों को पक्षकार बनने के लिए आह्वान किया गया था। परंतु नियत तिथि तक कोई अन्य पक्ष उपस्थित नहीं हुआ था। सिर्फ कार्यवाही को अनावश्यक रुप से विलंबित करने के लिए यह प्रार्थना पत्र दिया गया है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने प्रार्थना पत्र में यह जिक्र नहीं किया है कि उन्हें किसका वादमित्र बनाया जाए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मुकदमे से संबंधित अपना साक्ष्य और महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्य देकर उनकी मदद कर सकते हैं। इसके लिए उनको वादमित्र अथवा पक्षकार बनना आवश्यक नहीं है। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से अधिवक्ता तौहिद खान व अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के अधिवक्ता रईस अहमद की ओर से दलील दी गई कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का प्रार्थना पत्र प्रतिनिधित्व वाद की परिधि में नहीं आता है और प्रार्थना पत्र में उनकी ओर से की गई अपील विधिविरुद्ध है। उक्त मुकदमे में वे आवश्यक व जरुरी पक्ष नहीं हैं। इनको पक्षकार बनाये बिना भी मुकदमे का निस्तारण संभव है। यदि इन्हें पक्षकार बनाया जाता है तो न्यायालय में लंबित मुकदमों की सुनवाई प्रभावित होगी। सभी पक्षकारों ने अपने-अपने दलील के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की नजीरों को भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।

दस मार्च को हाईकोर्ट में होनी है सुनवाई

काशी विश्वेश्वरनाथ मंदिर व ज्ञानवापी मस्जिद विवाद की पोषणीयता को लेकर लंबित याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई जारी है। अगली सुनवाई के लिए दस मार्च की तिथि मुकर्रर है। बता दें कि ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण तथा हिंदुओ को पूजा पाठ करने का अधिकार आदि को लेकर वर्ष 1991 में प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ की ओर से पक्षकार पं.सोमनाथ व्यास,हरिहर पाण्डेय  आदि ने मुकदमा दायर किया था। न्यायालय के आदेश पर पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल)विजय शंकर रस्तोगी को 11अक्टूबर 2019 को वाद मित्र नियुक्त किया गया था। इससे पूर्व वर्ष 2015 में स्वयंभू ज्योतिर्लिंग विश्वेश्वरनाथ न्यास के मंत्री नियुक्त हुए थे।

सर्वेक्षण कराने की अपील पर 15 मार्च को होगी सुनवाई

ज्ञानवापी मामले में ही वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी की ओर से कथित विवादित परिसर का भौतिक और पुरातात्त्विक दृष्टि से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से राडार तकनीक से सर्वेक्षण कराने की अपील पर सुनवाई के लिए सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) ने 15 मार्च की तिथि मुकर्रर की है। विजय शंकर रस्तोगी ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान दस दिसंबर 2019 को ही अदालत में प्रार्थना दिया था। 

उधर इसी मामले में जिला जज ओमप्रकाश त्रिपाठी ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अंजूमन इंतजामिया मसाजिद की ओर से दाखिल निगरानी याचिका पर सुनवाई के लिए 25 मार्च की तिथि मुकर्रर की है। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अंजूमन इंतजामिया मसाजिद ने उक्त मामले की सुनवाई के क्षेत्राधिकार को लेकर सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) के निर्णय के खिलाफ जिला जज की अदालत में निगरानी याचिका दायर किया है। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अंजूमन इंतजामिया मसाजिद सुनवाई के क्षेत्राधिकार को लेकर प्रश्न उठाए थे जिसे सिविल जज की अदालत ने खारिज कर दिया था।

होनी है सुनवाई

ज्ञानवापी परिक्षेत्र में ही नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा पाठ करने का अधिकार देने को लेकर दाखिल दावा पर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) एम के सिंह की अदालत में सुनवाई के लिए नौ मार्च की तिथि मुकर्रर है। यह मुकदमा सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता हरिशंकर जैन और अन्य द्वारा 18 फरवरी 2021 को प्रभारी सिविल जज की अदालत में दाखिल किया गया था। अदालत ने उसी दिन इसे प्रकीर्णवाद के रुप में दर्ज करते हुए पीठासीन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया था।

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