वाराणसी में अपनी बिजली से चलेगी एसटीपी, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई ने शासन को भेजा 90 करोड़ का प्रस्ताव

सीवेज को जिस प्लांट में शोधित किया जा रहा है, उसे ऊर्जा को लेकर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।
Publish Date:Wed, 30 Sep 2020 06:31 AM (IST) Author: Saurabh Chakravarty

वाराणसी, जेएनएन। नगर से निकल रहे सीवेज को जिस प्लांट में शोधित किया जा रहा है, उसे ऊर्जा को लेकर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। मसलन, अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को चलाने के लिए ग्रिड से ली गई बिजली की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके लिए दो विकल्पों पर काम हो रहा है। पहला सौर  ऊर्जा प्लांट है तो दूसरा एसटीपी से निकलने वाली ज्वलनशील गैस है।

जल निगम की गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई ने सौर ऊर्जा प्लांट लगाने के लिए 90 करोड़ का प्रस्ताव शासन को भेजा है। इस भारी-भरकम बजट से रमना व गोइठहां सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के अलावा कोनिया के लिङ्क्षफ्टग पंप परिसर में सौर ऊर्जा के पैनल लगाए जाएंगे। प्रस्ताव के मुताबिक रमना में 11 मेगा वॉट का सौर ऊर्जा प्लांट  लगाया जाएगा। ऐसे ही गोइठहां में 1.2 मेगा वाट तो कोनिया लिङ्क्षफ्टग पंप परिसर में 800 किलो वॉट का प्लांट  लगेगा। इन सौर ऊर्जा के प्लांटों से 60 फीसद ग्रीड की बिजली पर निर्भरता कम हो जाएगी। शेष बिजली  का  इंतजाम एसटीपी से निकलने वाली गैस से किया जाएगा। इस गैस से प्लांट के जेनरेटर चलेंगे जो ग्रीड की  बिजली का बड़ा कारगर विकल्प होगा। गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के अधिशासी अभियंता विवेक ङ्क्षसह के अनुसार 120 एमएलडी के प्लांट संचालन में माह में औसतन 35 लाख रुपये खर्च होते हैं। प्लांट लगने के बाद 18 लाख तक की बचत होगी।

मिथेन व कार्बन डाई आक्साइड गैस से बिजली उत्पादन

एसटीपी संचालन के दौरान मलजल शोधन में मिथेन व कार्बन डाई आक्साइड गैस का भी उत्पादन होता है। यह ज्वलनशील होता है। इसके लिए एसटीपी परिसर में ही गैस चैंबर बनाया जाता है। इसमें जमा गैस से प्लांट के जेनरेटर चलाए जाते हैं। 60 से 65 फीसद हिस्सा मिथेन और 25 से 30 फीसद कार्बन डाई आक्साइड होता है। 100 एमएलडी की क्षमता वाले एसटीपी में 4000 से 5000 क्यूबिक मीटर गैस का उत्पादन किया जाता है।

मॉडल बना दीनापुर प्लांट, दो करोड़ की बचत

बिजली को लेकर आत्मनिर्भरता के लिए दीनापुर एसटीपी मॉडल है। यहां पर सौर ऊर्जा प्लांट लगा दिया गया है लेकिन बिजली की बड़ी खपत की पूर्ति प्लांट में उत्पादित गैस से पूरी की जाती है। इसका नतीजा है कि करीब दो करोड़ रुपये सालाना की बचत गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की हो जाती है। यहां प्लांट संचालन के लिए ग्रीड से बिजली ली जाती है। एक वर्ष में करीब चार करोड़ 80 लाख रुपये खर्च होते हैं। गैस से प्लांट संचालन में दो करोड़ रुपये बच जाते हैं।

सौर ऊर्जा प्लांट के लिए 90 करोड़ का प्रस्ताव भेजा गया है

सरकार की मंशानुसार ऊर्जा को लेकर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। दो विकल्पों पर काम हो रहा है। एक सौर ऊर्जा तो दूसरा गैस आधारित बिजली उत्पादन प्लांट बनाए जा रहे हैं। सौर ऊर्जा प्लांट के लिए 90 करोड़ का प्रस्ताव भेजा गया है।

- एके पुरवार, महाप्रबंधक गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई

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