अनछुए इतिहास के नायक होंगे स्कंदगुप्त, खोजी जाएगी गुमनाम नायकों की दास्तां varanasi news

वाराणसी, जेएनएन। भारत के इतिहास लेखन में न्याय न होने बात अरसे से उठाई जाती रही है। अतीत की तमाम घटनाओं और शख्सियतों को जानबूझ कर छुपाए या दबाए रखने के मसले को लेकर ही इतिहास के पुनर्लेखन की मांग भी उठती रही। अब ऐसे अनछुए इतिहास को नए सिरे से सत्य तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर लिखे जाने की पहल बीएचयू से शुरू होने जा रही है। इतिहास के इस पुनर्लेखन के पहले नायक होंगे सम्राट स्कंदगुप्त विक्रमादित्य जिन्होंने बर्बर हूणों को भारत की धरती पर न सिर्फ परास्त किया बल्कि सीमाओं से बाहर भी खदेड़ा।

बीएचयू में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'गुप्तवंशैक-वीर: स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का ऐतिहासिक पुन:स्मरण एवं भारत राष्ट्र का राजनीतिक भविष्य के अंतिम दिन 'गुप्तकालीन भारत का वैश्य आयाम व 'स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का पुन:स्मरण एवं भारत के सम्मुख राजनीतिक चुनौतियों का परिप्रेक्ष्य विषय पर चर्चा हुई। जंतु विज्ञान विभाग, बीएचयू के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने शोध पत्र प्रस्तुत किया। बताया पूर्वांचल के कई जिलों में डीएनए सैंपल के गहन अध्ययन किए गए, लेकिन यहां के लोगों में हूणों का कोई डीएनए नहीं मिला। जापान के प्रो. ओइवा तकाकी ने कहा प्राचीन काल के इतिहास पर नजर डालें तो जापान की धर्म-संस्कृति पर भारत विशेषकर गुप्तकाल का प्रभाव दिखाई देता है। वियतनाम की डा. डू थू हा ने भारत को समझने के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथों का हवाला दिया। प्रो. मारुतिनंदन तिवारी ने भारतीय कला के योगदान और गुप्तकाल के वैश्विक प्रभाव को स्पष्ट किया। थाइलैंड के प्रो. एनसी पंडा ने कहा कि थाईलैंड के राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में गरुण का प्रयोग उसी रूप में होता है, जिस रूप में भारत में अशोक स्तंभ। वहीं डा. आनंदवद्र्धन व डा. अभिलाषा द्विवेदी ने गुप्तकाल के सैन्य प्रणाली को काफी विकसित बताया। कहा भारतीय लोकमानस एवं लोकगीतों में स्कंदगुप्त की वीरता की गाथा आज भी गाई जाती है। इस दौरान जेएनयू के प्रो. संजय भारद्वाज, डीएनए विशेषज्ञ डा. नीरज राय, डा. अखिलेश चौबे, प्रो. विभा त्रिपाठी आदि ने विचार प्रस्तुत किए।

अनछुए इतिहास के पुनर्लेखन को बने केंद्र

दो की परिचर्चा के बाद निष्कर्ष निकाला गया कि स्कंदगुप्त पर मौलिक शोध के लिए बीएचयू में इंटरडिसिप्लिनरी (अंतर्विषयक) केंद्र बनाया जाए, ताकि स्कंदगुप्त के साथ ही अन्य गुमनाम नायकों की दास्तां को इतिहास में दर्ज कराया जा सके। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए भारत अध्ययन केंद्र के शताब्दी पीठ प्रोफेसर कमलेश दत्त त्रिपाठी ने कहा कि स्कंदगुप्त विक्रमादित्य को बार-बार याद करने की वजह ये है कि उसने बार-बार हूणों को भारत से बाहर ढकेला था। भारत फिर से घुसपैठियों से भर गया है, सरहदों पर शत्रु सर उठा रहे हैं। जैसे स्कंदगुप्त ने अपने पुरखों का स्मरण कर भारत के शत्रुओं को कुचल दिया, उसी तरह हमें भी स्कंदगुप्त कर स्मरण कर भारत को चुनौतियों से मुक्त कराने के लिए बौद्धिक व अकादमिक जागृति पैदा करनी होगी। संपूर्ति सत्र की विस्तृत रिपोर्ट डा. अनूप पति तिवारी ने दी। संचालन प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी व धन्यवाद ज्ञापन संयोजक प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय ने किया।

 

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