परिनिर्वाण दिवस पर वाराणसी में डाक्‍टर भीमराव आंबेडकर के कृतत्व और उनके आदर्शों को किया स्मरण

आजादी का अमृत महोत्सव एवं चौरी चौरा शताब्दी वर्ष के अर्न्तगत भारत रत्न बाबा साहब डॉ . भीमराव आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर सोमवार को आंबेडकर स्मारक कचहरी में डॉ आम्बेडकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि का कार्यक्रम शुरू हुआ।

Saurabh ChakravartyMon, 06 Dec 2021 01:21 PM (IST)
बाबा साहब डॉ . भीमराव आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर कचहरी में पुष्पांजलि का कार्यक्रम शुरू हुआ।

वाराणसी, जागरण संवाददाता। आजादी का अमृत महोत्सव एवं चौरी चौरा शताब्दी वर्ष के अर्न्तगत भारत रत्न बाबा साहब डॉ . भीमराव आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर सोमवार को आंबेडकर स्मारक कचहरी में डॉ आम्बेडकर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि का कार्यक्रम शुरू हुआ। यह शाम पांच बजे तक होगा। इसी दौरान दो बजे से रात आठ बजे तक संगोष्ठी होगी जिसमें वक्ताओं द्वारा डॉ आंबेडकर के कृतत्व व उनके आदर्श विचारों को रखा जाएगा। देश की आजादी और संविधान निर्माण में उनके अमूल्य योगदान से देश की युवा पीढ़ी को अवगत कराया जाएगा।

जिला प्रशासन वाराणसी, अखिल भारतीय अनुसूचित जाति जनजाति कर्मचारी कल्याण एसोसिएशन, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति एवं अन्य पिछड़ी जाति कर्मचारी कल्याण एसोसिएशन की ओर से आयोजित कार्यक्रम के तहत स्मारक के पास ही बुक स्टाल लगाया गया है। इसमें डॉ आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तकों समेत अन्य विद्वतजनों द्वारा बहुमूल्य विचारों के संग्रह स्वरूप पत्रिकाओं को भी सजाया गया है।

दरअसल, डॉ भीमराव आम्बेडकर का जीवन संघर्षों की पूरी एक गाथा है। विषम स्थितियों में भी उनके विचारों के प्रवाह कभी रुके नहीं बल्कि समाज के शोषित और वंचित वर्ग के लिए सदैव बुलन्द होते रहे। उनके विचारों में अखंड भारत में समान सामाजिक आधारशिला पर मजबूत लोकतंत्र समाहित है। उन्होंने एक की बलि देकर दूसरे की उन्नति का स्वप्न कभी नहीं देखा जबकि उनके जीवन में कई ऐसे क्षण आये जिसमें इन्हें सामाजिक भेदभाव के दंश से गुजरना पड़ा।

नागपुर में बौद्ध धर्म अपनाने के बाद काशी पहुंचे थे बाबा साहब भीमराव आंबेडकर

संविधान निर्माता डा. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14अप्रैल 1891 को हुआ था। अप्रैल यानी वसंत ऋतु जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को नवीनता देती है। ये ज्योतिबा फूले और राहुल सांकृत्यायन के जन्म का भी माह है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति ने ज्ञान-विचारशीलता और सहृदयता तीनों का मानव धर्म के विकास के लिए सृजन किया। ये दिन भारत के आधुनिक इतिहास में अमर रहेगा, क्योंकि सदियों से शोषित पीडि़त करोड़ों जनता को 129 वर्ष पूर्व सामाजिक-आर्थिक, धार्मिक-राजनीतिक आंदोलनों के लिए प्रेरित करने वाले मुक्तिदाता का जन्म हुआ था, जो बौद्ध धर्म अपनाने के बाद वर्ष 1956 में काशी भी आए थे।

बाबा साहब ने 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके बाद जब वे वाराणसी के कैंट स्टेशन पर रात एक बजे उतरे तो बीएचयू के छात्रों, बौद्ध अनुयायियों ने उनका भव्य स्वागत किया। वह सारनाथ बौद्ध मंदिर भी गए। 24 नवंबर को बीएचयू व काशी विद्यापीठ में छात्रों को संबोधित किया। जहां कहा कि जो काम शंकराचार्य ने हिंदुओं के लिए किया वही काम धर्म के लिए मैं करूंगा। सभाकक्ष में शंकराचार्य के विचार ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या पर बोलते हुए कहा कि ब्रह्मï सर्वव्यापी है तो ब्राह्मïण व अछूत बराबर हुए लेकिन शंकराचार्य ने अपना वाद समाज व्यवस्था पर लागू नहीं किया और अपने वाद को वेदांती स्तर पर ही लागू किया। यदि उन्होंने सामाजिक स्तर पर लागू किया होता तो उनका साध्य कहीं अधिक गहरा व विचार योग्य होता। इसके अलावा उनका यह विश्वास भ्रामक था कि संसार एक स्वप्न है।

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