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जान पर खेलकर बच्‍चे की जान बचाने वाले बहादुर जवान पवन के नाम से घर तक बनेगी पक्की सड़क

वाराणसी, जेएनएन। वाराणसी के चौबेपुर थाने के गोलधमकवा गांव निवासी सीआरपीएफ के जवान पवन कुमार चौबे ने एक मासूम की जान बचाकर देश का गौरव ऊंचा किया है। अब उनके नाम पर घर तक सड़क बनेगी।  सीआरपीफ के कमांडेंट नरेंद्र पाल सिंह ने पवन की वीरता और शौर्य की प्रशंसा तथा बधाई देने चौबेपुर पहुंचे। उन्होंने पवन के पिता सुभाष, माता हौसिला, पत्नी सुभानसी, पुत्र दिव्‍यांश, पुत्री दिव्‍यांशी को माला फूल, अंग वस्त्र, फल व मिष्ठान देकर सम्मानित किया।

बोले कमांडेंट, मासूम की जान बचाकर मानवता का मिशाल कायम किया

कमांडेंट नरेंद्र पाल सिंह ने बताया पवन कुमार चौबे ने एक मासूम बच्चे की जान बचाकर मानवता का मिसाल कायम किया है। सीआरपीएफ की उस पूरी टीम जो मोर्चा संभाली थी, बधाई के पात्र है। सभी ने मानवता का मिसाल कायम किया है। हर जवानों में हमेशा यही होता है कि आम जन को बचाते हुए उग्रवादियों से लड़ना है। पहले पब्लिक को सुरक्षित करते हुए ही हम उग्रवादियों पर गोली चलाते हैं। उस समय कोई आम जन प्रभावित न हो, हमेशा ध्यान रखा जाता है। पवन के पिता सुभाष ने घर तक आने-जाने वाले मार्ग को बनवाने की मांग की। कहा कि यहां बराबर नाबदान के गंदे पानी जमा रहता है। इस पर कमांडेंट नरेंद्र पाल सिंह ने कहा कि हम पूरा प्रयास करेंगे। डीएम से मिलकर पवन के नाम पर एक किलोमीटर पक्की सड़क बनवाने का प्रयास करेंगे। इस दौरान सुरेश कुमार द्वितीय कमान अधिकारी सहित सीआरपीएफ के तमाम लोग मौजूद रहे।

जवान के शहीद होने से दुखी हैं पवन

तीन जवान घायल होने और एक जवान के शहीद होने पर वह बहुत दुखी हैं। मोबाइल पर दैनिक जागरण से बातचीत के दौरान पवन कुमार चौबे ने बताया कि उन्‍होंने 2010 में सीआरपीएफ में ज्‍वाइनिंग किया। पल्लीपुरम केरला में ट्रेंनिग के बाद पहली पोस्टिंग 2011 से 2016 तक 203 कोबरा बटालियन में रही। यहां उन्‍होंने नक्सलियों से दो-दो हाथ करते हुए उनके दांत खट्टे किए।

2016 से जम्‍मू- कश्मीर में तैनात हैं पवन

इसके बाद 2016 से जम्‍मू- कश्मीर में सोपोर, बारामुला में पोस्टिंग थी। बुधवार यानी 1 जून की सुबह साढ़े सात बजे सीआरपीएफ की टीम नाका के लिए आई थी। हर जगह पोस्ट पर दो-दो जवानों को बुलट प्रूफ गाड़ी से उतारकर आगे बढ़ रही थी। बीपी मोर्चा के लिए बुलेट प्रूफ गाड़ी खड़ी हुई, तभी आतंकियों ने फायर कर दिया। इस फायरिंग में हेड कांस्टेबल दीपचंद वर्मा शहीद हो गए और तीन जवान साथी घायल हो गए। इसी दौरान एक नागरिक की भी मौत हो गई। उसके शव पर मासूम बालक रो रहा था। धड़धड़ाती गोलियों के बीच मैं जवानों के सहयोग से छिपते हुए नजदीक जाकर बच्चे को इशारा कर बुलाया जिसके बाद वह मेरे पास आ गया। गोंद में लेकर उसकी जान बचाई। इसके बाद घायल साथियों को अस्पताल भेजवाया। तब तक डीजीपी सहित तमाम बड़े सीआरपीएफ के अधिकारी मौके पर पहुंच गए।

बोले पिता, पवन ने पूरे देश का नाम रोशन किया

पवन की इस बहादुरी से उनके परिवारीजन बहुत प्रसन्‍न है। पिता सुभाष चौबे, दादा कल्लू चौबे, मां हासिल चौबे का कहना है कि पवन पर हमें गर्व है। उनके इस कारनामे को पत्नी सुभानसी चौबे, पुत्र दिव्‍यांश चौबे, पुत्री दिव्‍यांशी चौबे ने भी सराहा। कहना था कि देश सेवा से बढ़कर कुछ भी नहीं है। सुभाष चौबे का कहना है कि पवन ने गांव-शहर ही नहीं, पूरे देश का नाम रोशन किया है। वहीं उनकी इस बहादुरी पर काशीवासी सहित पूरा देश सलाम कर रहा है।

देश सेवा में गोलधमकवा के नौजवानों का रहा है इतिहास

गरथौली गांव के गोलधमकवा बस्ती का आजादी के समय भारत-पाकिस्तान लड़ाई में भी काफी योगदान रहा है। इस छोटे से गांव में आधा दर्जन फौजी है। 1962 की लड़ाई में स्व. कमला चौबे सूबेदार ने चीन के साथ लड़े। फिर 1965 व 1971 की लड़ाई में रहे। स्व. शारदा चौबे 1965, 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिए। नागेंद्र प्रसाद चौबे सूबेदार से रिटायर्ड है। इन्होंने आर्मड रेजिमेंट में कुपवाड़ा, श्रीनगर, जम्‍मू आदि में देश सेवा कर चुके हैं। रामसुरेश चौबे इस समय कैंसर पीड़ित है। रामसुरेश चौबे भी भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में 1965 व 1971 में वीरता का परिचय चुके है। इसके बाद रिटायर्ड हवलदार दुर्गेश चौबे भी सेना के सिग्नल कोर से रिटायर हैं। गांव के ही अतुल कुमार चौबे अभी सेना में अपनी सेवा दे रहे है। इस गांव का आजादी के समय से इतिहास रहा है। अंग्रजों से लड़ते समय इस गांव में गोला बारूद रखा जाता रहा, इसी कारण अंग्रेजो ने इस गांव का नाम गोलधमकवा रख दिया था।

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