वाराणसी में अधिकारी भी हैरान, गंगा की गाद को गंगा की गोद में ही जिम्‍मेदारों ने पहुंचा दिया

बाढ़ में गंगा नदी द्वारा बहाकर लाई गई गाद घाटों के किनारों पर जमा है। लगभग 25-30 फीट ऊंची जमी इस गाद के निस्तारण का नमामि गंगे द्वारा गंगा के पक्के घाटों की सफाई का जिम्मा संभाली कार्यदायी संस्था विशाल प्रोटेक्शन फोर्स ने बहुत ही हैरतअंगेज तरीका खोज निकाला है।

Abhishek SharmaTue, 23 Nov 2021 03:49 PM (IST)
बाढ़ में गंगा नदी द्वारा बहाकर लाई गई गाद घाटों के किनारों पर जमा है।

वाराणसी, जागरण संवाददाता। बाढ़ में गंगा नदी द्वारा बहाकर लाई गई गाद घाटों के किनारों पर जमा है। लगभग 25-30 फीट ऊंची जमी इस गाद के निस्तारण का नमामि गंगे द्वारा गंगा के पक्के घाटों की सफाई का जिम्मा संभाली कार्यदायी संस्था विशाल प्रोटेक्शन फोर्स ने बहुत ही हैरतअंगेज तरीका खोज निकाला है। गाद की जेसीबी मशीनों से खोदाई कराकर उसे पानी के साथ गंगा नदी में ही बहाया जा रहा है। सोमवार को गंगा सफाई का यह अजीबोगरीब कारनामा अस्सी घाट से शुरू हुआ। जिसने भी देखा, वह समझ नहीं सका कि यह गंगा की सफाई का अभियान है या गंगा को और गंदा करने का। वैसे, घाटों की सफाई का यह तरीका प्रशासनिक विभागों में समन्वय की कमी को ही उजागर कर रहा था।

नमामि गंगे ने पक्के घाटों की सफाई की जिम्मेदारी कार्यदायी संस्था विशाल प्रोटेक्शन फोर्स को सौंपी है। सोमवार की दोपहर लगभग 12 बजे अस्सी घाट पर फोर्स के आपरेशन आफिसर जेपी सिंह व एक अन्य अधिकारी विकास सिंह दो जेसीबी के साथ पहुंचे। जेसीबी मशीनों से घाट पर जमी गाद की खोदाई शुरू हुई और उसे 16 पंपों की सहायता से पानी की तेज धार के साथ नदी में बहाया जाना शुरू किया गया। यह देख गंगा पर्यावरण प्रेमियों और नदी विशेषज्ञों में हैरान रह गए।

कार्यदायी संस्था का दावा हास्यास्पद : इस बारे में कार्यदायी संस्था के आपरेशन मैनेजर जेपी सिंह से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि इससे नदी को कोई नुकसान नहीं है। हम गाद को लिक्विड फार्म में नदी में भेज रहे हैं, यह नदी के प्रवाह के साथ बह जाएगी।

खेती के लिए सोना सरीखा काफी उपजाऊ होती है यह मिट्टी : हर साल बाढ़ से भारी तबाही होती है लेकिन इस मंजर के बीच नदियां कुछ चीजें वरदान के रूप में देती है। इसमें सबसे अहम होती है जलोढ़ उपजाऊ मिट्टी। खेती-बाड़ी के लिए यह सोना सरीखा होती है। कृषि वैज्ञानिक ही नहीं किसान भी सदियों से इसे बहुत ही उपजाऊ मिट्टी मानते रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य, काशी के 84 घाटों पर यह मिट्टी पुन: गंगा में ही डाली जा रही है। प्रक्रिया पिछले कई वर्षों से जारी है। गीली मिट्टी पेयजल पाइप के माध्यम से गंगा में बहा दी जाती है तो वहीं सूखी मिट्टी की खोदाई कर इसे पुन: गंगा में उड़ेल दिया जाता है।

नदी पर्यावरण और संरचना को खतरा : गंगाविद बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी कहते हैं कि गंगा में गाद को डालना, नदी पर्यावरण और संरचना के लिए खतरनाक है। यह गाद अल्पमात्रा में नहीं है, सभी घाटों पर हजारों ट्रक होगी। यह बहेगी, नहीं बल्कि तलहटी में जम जाएगी। इससे नदी उथली होगी और बाढ़ का खतरा और बढ़ जाएगा। प्रधानमंत्री के जल-परिवहन का सपना तो दूर, गंगा में नाव भी चलने की स्थिति नहीं होगी। इससे जल में आक्सीजन की कमी होगी, तो जलीय जंतुओं को भी खतरा होगा।

नहीं बहेगी मिट्टी, खनन विभाग किसानों को उपलब्ध कराए : जागरण द्वारा जब इस संबंध में जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा को जानकारी देते हुए उनसे पूछा गया तो उन्होंने तत्काल मिट्टी को नदी में बहाने से रोकने का आदेश दिया। खनन विभाग को निर्देशित किया कि मिट्टी का उठान कराएं। किसान अगर मिट्टी लेना चाहता है तो उसे निश्शुल्क उपलब्ध कराएं। अगर घाट पर वाहन जाने की स्थिति नहीं है तो नाव से परिवहन करके उन घाटों पर मिट्टी एकत्रित किया जाए, जहां आसानी से वाहन पहुंच जाएं। इस कार्य में किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

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