काशी के ठाठ ये गंगा के घाट : जीर्णोद्धार से मिली 'मुंशी' घाट को पहचान

वाराणसी में मुंशी घाट की अलग ही पहचान है।

JagranPublish:Sun, 24 Jun 2018 03:22 PM (IST) Updated:Sun, 24 Jun 2018 03:22 PM (IST)
काशी के ठाठ ये गंगा के घाट : जीर्णोद्धार से मिली 'मुंशी' घाट को पहचान
काशी के ठाठ ये गंगा के घाट : जीर्णोद्धार से मिली 'मुंशी' घाट को पहचान

वाराणसी : गंगोत्री से गंगा सागर तक कल कल करती गंगा की लहरों में न जाने कितनी कहानियां पुराणों और उपनिषदों में कहीं गई हैं। गंगा और उसके घाटों की अनगिन कथाओं में गंगा की महिमा के साथ उन घाटों का भी महात्म्य का बखान मिलता है जिनसे शहरों को पहचान भी मिली है। कुछ इसी तरह काशी में चौरासी प्रमुख गंगा घाटों की भी मिशाल है। दैनिक जागरण अपने पाठकों को उन्हीं प्रमुख घाटों से अवगत कराने के लिए वेब सीरीज में घाटों की कथाएं लेकर आया है। उसी कड़ी में आज मुंशी घाट की महत्ता को जानते हैं।

देवाधिदेव महादेव शिव की नगरी काशी में घाटों का अत्यन्त महत्व है। हर घाट के अलग और निराले ठाठ हैं। प्राचीन काल से ही इन घाटों ने लोगों के हृदय में अपनी विशेष पहचान बना रखी है। बिना घाटों के तो काशी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इन घाटों पर तो मानों देश की सम्पूर्ण सभ्यता एवं संस्कृति विद्यमान हैं। इनमें से मुंशी घाट का अपना महत्व है।

इस घाट पर अठ्ठारहवीं सदी की शुरुआत में नागपुर के राजा के मंत्री श्रीधर मुंशी ने कराया था। कालांतर में उन्हीं के नाम से ही घाट की पहचान जुड़ गई।

वर्ष 1915 मे दरभंगा के राजा कामेश्वर सिंह ने इस घाट को तत्कालीन मालिक से इस घाट को खरीदा और यहां पर कई निर्माण करा कर घाट को भव्य स्वरूप प्रदान किया। घाट पर महल, राम जानकी मंदिर, नारायण स्वामी मंदिर, शिव मंदिर आस्था का केंद्र है।

घाट पर बनी प्रमुख इमारत पहले दरभंगा महल के तौर पर जानी जाती थी। कालांतर में यह अब बृजरमा पैलेस के नाम से पहचाना जाता है। पर्यटन की दृष्टि से भी यह आकर्षण का केन्द्र है और देसी विदेशी पर्यटकों का वर्ष भर आने जाने का क्रम लगा रहता है। वर्ष 1965 में राज्य सरकार ने घाटों के जीर्णोद्धार के क्रम में इस घाट पर भी पक्का निर्माण कराया और इसे भव्य स्वरूप दिया।