हिंदी आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की यादों को संजोए हुए है मीरजापुर, यहीं रचा हिंदी साहित्य का इतिहास

मीरजापुर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कर्मभूमि रहा और यहीं पर उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास रचा। हिंदी साहित्याकाश के चमकते तारे आचार्य रामचंद्र शुक्ल किसी परिचय के मोहताज नहीं है। मीरजापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग शिक्षक तो काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी प्राध्यापक पद को सुशोभित किया।

Saurabh ChakravartyMon, 18 Oct 2021 04:51 PM (IST)
मीरजापुर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कर्मभूमि रहा और यहीं पर उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास रचा।

जागरण संवाददाता, मीरजापुर। मीरजापुर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कर्मभूमि रहा और यहीं पर उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास रचा। हिंदी साहित्याकाश के चमकते तारे आचार्य रामचंद्र शुक्ल किसी परिचय के मोहताज नहीं है। हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक पंडित रामचंद्र शुक्ल के गांभीर और बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व का हिंदी साहित्य सदैव आभारी रहेगा। हिंदी आलोचक, निबंधकार, साहित्य-इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मीरजापुर स्थित आवास आज भी उनकी यादों को संजाेए हुए हैं। मीरजापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग शिक्षक तो काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी प्राध्यापक पद को सुशोभित किया।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म वर्ष 1884 में शरद पूर्णिमा पर बस्ती जिले के अगोना नामक गांव में हुआ था। पिता पंडित चंद्रबली शुक्ल की तैनाती सदर कानूनगो के पद पर मीरजापुर में होने के कारण सपरिवार रहने लगे। महज नौ वर्ष की अवस्था में माता का देहांत हो गया। अध्ययन के प्रति लग्नशीलता बाल्यकाल से ही थी। किंतु इसके लिए उन्हें अनुकूल वातावरण न मिल सका। मीरजापुर के लंदन मिशन स्कूल से 1901 में स्कूल फाइनल परीक्षा उत्तीर्ण की। पिता की इच्छा थी कि कचहरी में जाकर दफ्तर का काम सीखें, लेकिन वह उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। पिता ने वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद भेजा पर उनकी रुचि वकालत की बजाए साहित्य में रही। वर्ष 1903 से 1908 तक आनंद कादंबिनी के सहायक संपादक का कार्य किया।

राकेश चंद्र शुक्ल ने बताया कि वर्ष 1904 से 1908 तक लंदन मिशन स्कूल में कला ड्राइंग के अध्यापक पद को सुशोभित किया। लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने के कारण उनकी विद्वता चारों ओर फैलने लगी। योग्यता से प्रभावित होकर 1908 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने हिन्दी शब्द सागर के सहायक संपादक की जिम्मेदारी सौंपी। नागरी प्रचारिणी पत्रिका के भी संपादक रहे। 1919 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए और बाबू श्याम सुंदर दास की मृत्यु के बाद जीवन के अंतिम काल वर्ष दो फरवरी 1941 तक विभागाध्यक्ष का पद सुशोभित किया।

अंध विश्वास के विरोधी थे आचार्य रामचंद्र शुक्ल

वंदना तिवारी बताया कि मेरे पिता स्व. राजेश दत्त शुक्ल अक्सर बब्बा (आचार्य पंडित रामचंद्र शुक्ल) के बारे में छोटी-छोटी कहानियां सुनाया करते थे। बताया कि राठ में बब्बा के पिता पंडित चंद्रबली शुक्ल को मन के अनुसार घर नहीं मिला। काफी तलाश के बाद एक मकान तय किया। लोग उस मकान को भूतहा और मनहूस कहते थे, लेकिन पंडित चंद्रबली शुक्ल, भूत-प्रेत नहीं मानते थे। उस मकान में ठाठ रहने लगे। पड़ोस की स्त्रियां चंद्रबली की माता और पत्नी को बताती थीं कि इस मकान में एक प्रेतात्मा का निवास है, जो किसी को भी एक या दो महीने से ज़्यादा टिकने नही देती। तभी शुक्ल ने लोकमत को पुष्ट करने का सोच लिया।

एक दिन सबके सो जाने पर वे उठे और मच्छरदानी के डंडे में चीथड़े लपेटकर मिट्टी के तेल में लपेटकर ठीक रात 12 बजे उसे जलाकर हाथों से उसे तानकर चक्कर लगाने के बाद सो गए। सुबह बताया कि रात में उन्होंने सैय्यद की लुआटी देखी थी, लेकिन घर वालों पे इसका कोई असर नहीं पड़ा। बब्बा के पिता एवं पितामही का भूत प्रेतों पर कोई विश्वास नहीं था। इस घटना का बब्बा के संस्कारों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

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