माधवराव सप्रे जयंती : हिंदी सहित्‍य और पत्रकारिता को विज्ञान और अर्थशास्त्र का समृद्ध शब्दकोश

माधवराव सप्रे का जन्म 19 जून 1871 और उनकी पुण्यतिथि 23 अप्रैल 1926 को मनाई जाती है। मराठी होने के बावजूद पंडित माधवराव सप्रे का पूरा जीवन हिंदी की सेवा और साधना बीता। भारतीय नव जागरण के पुरोधा कर्मयोगी पंडित सप्रे का हिंदी व काशी से गहरा लगाव था।

Abhishek SharmaSat, 19 Jun 2021 12:56 PM (IST)
माधवराव सप्रे का जन्म 19 जून 1871 और उनकी पुण्यतिथि 23 अप्रैल 1926 को मनाई जाती है।

वाराणसी [अजय कृष्ण श्रीवास्तव]। माधवराव सप्रे का जन्म 19 जून 1871 और उनकी पुण्यतिथि 23 अप्रैल 1926 को मनाई जाती है। मराठी होने के बावजूद पंडित माधवराव सप्रे का पूरा जीवन हिंदी की सेवा और साधना बीता। भारतीय नव जागरण के पुरोधा कर्मयोगी पंडित सप्रे का हिंदी व काशी से गहरा लगाव था। तभी तो वर्ष 1902 में उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के ‘विज्ञान शब्दकोश योजना' को मूर्तरूप देने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली। पंडित सप्रे ने न केवल विज्ञान शब्दकोश का संपादन किया, बल्कि अर्थशास्त्र की शब्दावली की खोज कर उन्होंने इसे संरक्षित और समृद्ध भी किया। विज्ञान शब्दकोश को समृद्ध कर मंजिल तक पहुंचाने में उनका योगदान उल्लेखनीय है। इस कार्य के लिए वह कई बार वाराणसी आए। प्रखर संपादक के रूप में लोक प्रहरी व सुधी साहित्यकार के रूप में उनकी भूमिका लोक शिक्षक की है। कोशकार और अनुवादक के रूप में उन्होंने हिंदी भाषा को समृद्ध किया।

पं. माधवराव सप्रे सुप्रसिद्ध कहानीकार एवं साहित्यकार थे। उन्होंने राष्ट्रीय कार्य के लिए उपयुक्त अनेक प्रतिभाओं की परख कर उनका उन्नयन किया। स्वतंत्रता संग्राम में भी उनकी अग्रणी भूमिका थी। पंडित सप्रे का जन्म 19 जून 1871 में मध्य प्रदेश के दमोह जिले के पथरिया ग्राम में हुआ था। मूलत: वह मराठी थे। उनके पूर्वज महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से आकर यहां बस गए थे। उनका हिंदी से खासा लगाव था। वह कहते थे कि ‘मैं मूलत: महाराष्ट्री हूं लेकिन, मुझे मौसी (हिंदी) ने पाल-पोस कर बड़ा किया है। मौसी यानी हिंदी पर उन्हेंं अभिमान था। मौसी (हिंदी) के इस प्रेम से वह कभी नहीं उबर पाए और उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी मौसी की सेवा में समर्पित कर दिया। वह हिंदी की प्रेरक शक्ति बने, महावीरप्रसाद द्विवेदी जैसी भूमिका निभाई। राष्ट्रभाषा हिन्दी का स्वरूप निर्धारण कर उसका संवर्धन किया, साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता की आधारशिला रखी। स्वदेश-प्रेम की स्याही में डूबी उनकी कलम प्रबल राष्ट्रीय चेतना का संवाहक बनी। मातृभाषा हिंदी के उन्नयन में उनका योगदान अविस्मरणीय रहा।

कहानीकार के रूप में भी छोड़ी अमिट छाप

पंडित माधवराव सप्रे भारतेंदु युग के लेखकों की तरह पत्रकार व साहित्यकार थे। कहानीकार के रूप में भी उन्होंने अमिट छाप छोड़ी है। छत्तीसगढ़ मित्रा (1900), हिंदी ग्रंथ माला (1906), हिंदी केसरी (1907) सहित कई पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों का संपादन प्रकाशन भी किया।

‘माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय'

19 जून 1984 को राष्ट्र की बौद्धिक धरोहर को संजोने और भावी पीढ़ियों की अमानत के रूप में संरक्षित करने के लिए जब भोपाल में एक अनूठे संग्रहालय की स्थापना हुई, तब पंडित सप्रे के कृतित्व के प्रति आदर और कृतज्ञता अभिव्यक्त करने के लिए संस्थान को ‘माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय' नाम दिया गया।

देशभक्ति में छोड़ दी शासकीय नौकरी

पं. सप्रे की मैट्रिक की पढ़ाई बिलासपुर में हुई और 1899 में कोलकाता विश्वविद्यालय से बीए किया। इसी क्रम में उनकी नियुक्ति तहसीलदार पद पर हुई लेकिन, वह शासकीय नौकरी छोड़कर बिलासपुर चले गए। यहां पर 'छत्तीसगढ़ मित्र' नामक मासिक पत्रिका निकाली। हालांकि यह पत्रिका तीन वर्षों में ही बंद हो गई। इसके बाद उन्होंने लोकमान्य तिलक के मराठी केसरी को हिंद केसरी के रूप में छापना शुरू किया। कदम यहीं नहीं रुके, उन्होंने हिंदी साहित्यकारों और लेखकों को एकसूत्र में बांधने की भी कोशिश की। इसी क्रम में नागपुर से हिंदी ग्रंथमाला का प्रकाशन किया। हिंदी साहित्य के महान सपूत पं. माधवराव सप्रे का निधन 23 अप्रैल, 1926 को रायपुर में हुआ।

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