बदलता बनारस : वाराणसी में सदियों बाद शिव को देख सकेंगी गंगा

वाराणसी [आशुतोष शुक्ल]। प्रधानमंत्री मोदी काशी में हैं तो इस चुनावी मौसम में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पांच वर्षों में बनारस में बदला क्या। स्वर्ग से उतरी गंगा जब काशी की सीमा में प्रवेश करने लगीं तो शिव ने अपना त्रिशूल धरती में गाड़कर उन्हें रोक दिया।

गंगा ने अनुमति मांगी तो शिव ने तीन शर्तें लगाईं। पहली, गंगा काशी में शोर नहीं करेंगी। दूसरी, काशी प्रवाह क्षेत्र के अपने जल में वह खतरनाक जीवों को पनपने नहीं देंगी और अंतिम यह कि कभी तट नहीं छोड़ेंगी।

यह है लोक मान्यता

तथ्य यह है कि शूलटंकेश्वर से आदि केशव तक की लगभग 12 किलोमीटर और 84 घाटों की दूरी में गंगा उत्तरवाहिनी हैं। जिसने अपनी जटाओं में गंगा का वेग समेट लिया, उन्हीं पर रीझी गंगा उन्हीं महादेव के पांव पखारने तट की ओर मंथर-मंथर बहती हैं। तट पर है काशी विश्वनाथ मंदिर। कभी गंगा बाबा दरबार देख पाती थीं लेकिन आबादी की बाढ़ और निरंतर हुए आक्रमणों ने उनका यह सुख छीन लिया। अब सदियों बाद गंगा 2021 में फिर वह दृश्य जी सकेंगी। अपने आराध्य के पांवों तक तो वह तब भी नहीं पहुंच सकेंगी परंतु ललिता या जलासेन घाट से मंदिर उनके सामने होगा।

सनातनी मन की यह बड़ी उपलब्धि 

बीते पांच वर्षों में हुआ बनारस का ढांचागत विकास अपनी कहानी खुद सुना रहा है पर इसी काशी में उस मंदिर परिसर के कायापलट की कोशिशें भी शुरू हैं जो सनातनी आस्था का एक मुख्य केंद्र है। प्रधानमंत्री ने कभी बाबा दरबार का विस्तार व सुंदरीकरण सोमनाथ मंदिर की तरह करने का सुझाव दिया था। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री ने भक्तों के लिए बाबा तक जाने की राह सुगम करने की बात कही।

श्रीकाशी विश्वनाथ धाम कॉरीडोर परियोजना शुरू होते ही मंदिरों के टूटने, अतिक्रमण और गलियां नष्ट होने का शोर तो मचा लेकिन, बात इससे बहुत आगे की है। स्थानीय दबावों और आग्रहों से भी बहुत आगे की...। सात सौ करोड़ रुपये की यह परियोजना किसी मंदिर का सामान्य सुंदरीकरण नहीं है। मंदिर को अब चारों ओर से खोला जा रहा है। उसे इतना विस्तृत किया जा रहा है कि जून 2021 में परियोजना पूरी होने के बाद 39 हजार वर्ग मीटर में केवल मंदिर ही दिखेगा। ज्ञानवापी मस्जिद की तरफ से मंदिर तक जाने का मार्ग पहले ही चौड़ा किया जा चुका है और अब मंदिर के पूरब में गंगा की तरफ अभियान चल रहा है। मंदिर से ललिता घाट जाने वाले मार्ग को काफी कुछ साफ किया भी जा चुका है। हां, घाट से खड़े होकर मंदिर अब भी नहीं देखा जा सकता। दोनों के बीच में निर्मल मठ है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दखल के बाद ही उसे हटाया जा सकेगा। मठ के चारों ओर का निर्माण गिराया जा चुका है और उसकी दीवारें हटते ही गंगा और शिव सम्मुख होंगे। जहां कभी नीलकंठ मोहल्ला होता था, वहां अब मैदान है।

इसी मैदान में हमें मिले सर्राफ राजेश वर्मा। कहने लगे, 'ई जौन होत हौ, ई जब हो जई तब्बै पता चली का होत हौ।' फिर अपने आप ही खड़ी बोली पर उतर आए और ठेठ बनारसी दार्शनिकता बखान दी, 'विध्वंस के बाद ही सृजन होता है।' सच यह है कि काशी कॉरीडोर का वर्तमान भविष्य में इतिहास बनने जा रहा है।

काशी के सामने एक उदाहरण तारकेश्वर मंदिर और रानी भवानी मंदिरों का है। इनके जीर्णोद्धार के समय भी हलचल हुई कि काशी की प्राचीनता समाप्त की जा रही। आज तारकेश्वर मंदिर का प्रांगण ध्यान और उपासना का बड़ा स्थल है। सनातनी मानस में काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर सबसे बड़ी पीड़ा बाबा दरबार तक पहुंचने के मार्ग को लेकर रही है। बारिश में मंदिर तक पहुंचना भक्तों के लिए हमेशा कड़वा अनुभव होता है। काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी तो यहां तक कहते हैं कि मंदिर के पश्चिम और उत्तर में भी अवैध निर्माणों को तोड़ा जाना चाहिए। उनकी सलाह मंदिर क्षेत्र को अंगूठी की तरह बनाने की है जिससे श्रद्धालु एक जगह से चलकर वापस वहीं पहुंच सके। उन्होंने कहा, 'साधना शांति में होती है जबकि अभी तो भक्त मंदिर तक पहुंचने में ही घबरा जाते हैं।' रास्ते की कठिनाइयों से भी अधिक कष्ट मंदिर के दुबके होने का है। उन्हें मंदिर के आभामंडल पर पर्दा पड़ा लगता है। मंदिर मुक्ति आंदोलन के पीछे की भावना भी यही रही।

काशी विश्वनाथ मंदिर व काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद के सीईओ विशाल सिंह हालांकि दूसरी तरह से अपनी बात कहते हैं। उनकी राय है कि, 'श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिहाज से श्रीकाशी विश्वनाथ धाम कॉरीडोर का निर्माण किया जा रहा है और इसके बन जाने के बाद देश विदेश से आने वालों को दिव्य अनुभूति होगी।'

काशी विश्वनाथ मंदिर को 1669 ई. में तोड़कर मुगल बादशाह औरंगजेब ने पास में ज्ञानवापी मस्जिद बनाई थी। इसकी देश भर में व्यापक प्रतिक्रिया हुई और आंदोलन आरंभ हो गए। वर्ष 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने दोबारा यह मंदिर बनवाया। मंदिर का वर्तमान स्वरूप अहिल्याबाई की ही देन है। एक तरह से 1780 के बाद बड़े स्तर पर मौजूदा निर्माण कार्य हो रहा है।

बनेगा आनंद कानन

कॉरीडोर के केवल 25 प्रतिशत हिस्से में श्रद्धालु सुविधाओं के लिए पक्का निर्माण होगा। बाकी क्षेत्र बिल्कुल खुला रखा जाएगा जहां आनंद कानन बनाने की योजना है। गलियों और मकानों को तोडऩे के दौरान 40 मंदिर मिले हैं। इन्हें सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी का माना जा रहा है। अब सरकारी योजना इन मंदिरों व विग्रहों को संरक्षित करके पूरे क्षेत्र को देवालय संकुल के रूप में विकसित करने की है। काशी में कहा जाता है-'काशी कबहूं न छांडिय़े विश्वनाथ दरबार।' बाबा का दरबार तभी सजता है जब उसमें योगिनी भी हों और भैरव भी। ये नए मिले मंदिर शिव दरबार की असल सज्जा होंगे।

पुनर्वास का पेंच

परियोजना में पुनर्वास का एक पेंच फंस रहा है। लाहौरी टोला के पुनीत यादव को मुआवजे से कोई परेशानी नहीं। वह तो उन्हें मिला पर उन्हें लगता है कि गली टूट जाने से उनकी पहचान चली गई। प्रसिद्ध कारमाइकल लाइब्रेरी भी कुछ समय बाद टूटने वाली है। इसके निचले भाग में दुकान करने वाले आशुतोष अग्रवाल की शिकायत है कि पहले बसाते, तब उजाड़ते। उधर विशाल सिंह का कहना है कि विस्थापित किए गए कारोबारियों को कॉरीडोर क्षेत्र में बनाई जा रही दुकानें प्राथमिकता पर आवंटित की जाएंगी। 

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