विश्व एथनिक दिवस : विरासत बचाने के लिए ठुकरा दी नौकरी, अब धोबिया नृत्य के बने प्रतीक

आजमगढ़ जिले में कई वर्ष पूर्व विलुप्त हो चली पूर्वांचल की गंवई लोक नृत्य को बचाने का प्रयास अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बन चुका है। उबारपुर लखमीपुर गांव के उमेश कन्नौजिया ने इसके लिए शिक्षक की नौकरी ठुकरा दी।

Abhishek SharmaSat, 19 Jun 2021 06:10 AM (IST)
विरासत सहेजने को ग्रामीण युवाओं को साथ जोड़ने में जुटे तो अभिभावकों का विरोध झेलना पड़ा

आजमगढ़ [राकेश श्रीवास्तव]। 16 वर्ष पूर्व विलुप्त हो चली पूर्वांचल की गंवई लोक नृत्य को बचाने का प्रयास अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बन चुका है। उबारपुर लखमीपुर गांव के उमेश कन्नौजिया ने इसके लिए शिक्षक की नौकरी ठुकरा दी। विरासत सहेजने को ग्रामीण युवाओं को साथ जोड़ने में जुटे तो अभिभावकों का विरोध झेलना पड़ा। डैमेज कंट्रोल को संस्कृति विभाग से मिले पारीश्रमिक का एक-एक रुपये साथियों में बांटना शुरू किए तो मिशन मंजिल की ओर बढ़ चला। उमेश का सफर अब गांव, कस्बा से निकल स्वतंत्रता दिवस, अनुसूचित जाति-जनजाति, अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में पहुंच धोबिया नृत्य का प्रतीक बना तो उनकी संस्था धोबिया लोक नृत्य सेवा संगीद नाटक आकद्मी में शीर्ष पर जा पहुंची है।

धोबिया नृत्य क्या है?

धोबिया नृत्य संदेश देने वाली एक कला है। इस लोक नृत्य के जरिए धोबी व गधे के मध्य आजीविका संबंधों का भावपूर्ण प्रदर्शन किया जाता है। कलाकार मंच पर इसे कुछ इस कदर जीते हैं कि संदेश जीवंत हो उठता है। यही संदेश देश ही नहीं लोक नृत्य को विदेशी मेहमानों की नजर में खास बना देता है।

बरात में धोबिया नृत्य देख जागा प्रेम

दो दशक पूर्व बरातों में धोबिया नृत्य का प्रचलन था। उमेश उन दिनों में बरातों में धोबिया नृत्य घंटों देखते रहते थे। संदेश को समझे तो लोक नृत्य को जीवंत करने की ठान ली। वर्ष 2005 में 10 वीं की परीक्षा पास की तो मुसई कन्नौजिया को गुरू मान धोबिया नृत्य का झंडा लेकर निकले तो सफलता अर्जित करते धोबिया नृत्य के पहचान बन गए।

सफलता के आइने में पूर्वांचल का धोबिया नृत्य

आगरा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने नृत्य पेश किए।

कुल्लू मनाली व पंजाब में अनुसूचित जाति-जनजाति महोत्सव में प्रस्तुति दी।

स्वतंत्रा दिवस पर राजपथ पर कला का प्रदर्शन किए।

अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव नई दिल्ली में नृत्य दिखाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उमेश को अपने आवास पर बुलाकर मिले थे।

‘बचपन में बरात में धोबिया नृत्य देखना अच्छा लगता था। बड़ा होने के दौरान उसका संदेश समझ में आया तो लगा कि यह विधा तो धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। मैं विरासत को संजोने में जुटा तो मुसई कन्नौजिया को गुरु मान पीछे मुड़कर नहीं देखा। बालीवुड के कलाकारों ने भी धोबिया नृत्य देखा है। छह भाइयों में बीएड तक की पढ़ाई मैने ही पूरी की तो स्वजन को उम्मीद थी, जो मेरे निर्णय से टूट गई। हालांकि, अब मेरी पहचान, मेरे कला के कद्रदानों की बढ़ती संख्या के कारण सबकुछ अनुकूल हो चला है। - उमेश कन्नौजिया, राष्ट्रीय लोक नृत्य कलाकार।

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