जल पुरुष डॉक्टर राजेंद्र सिंह ने गंगा की दशा पर जताई चिंता, संवेदनहीनता ने वाराणसी में गंग धार में किया अवरोध

वाराणसी के मैदागिन स्थित पराड़कर स्मृति भवन में काशी विचार मंच के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉक्टर राजेन्द्र सिंह ने कि आज देश की प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी संवेदनहीन हो गई है। इसकी संवेदनहीनता गंगा की स्थिति बिगाड़ने में काफी हद तक जिम्मेदार है।

Saurabh ChakravartyWed, 23 Jun 2021 05:38 PM (IST)
वाराणसी के पराड़कर स्मृति भवन में काशी विचार मंच के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉक्टर राजेन्द्र सिंह

वाराणसी, जेएनएन। कल-कल निनाद करती गंगा के तट पर बसी काशी में बुधवार को गंगा की दशा और दिशा पर जबर्दस्त चर्चा हुई। चिन्तकों ने गंगा के सवाल ( गंगा पर एकाग्र गोष्ठी ) में एकजुट होकर जल पुरुष पद्मश्री डॉक्टर राजेन्द्र सिंह कीअगुआई में एक नारा दिया कि गंगा के बचाओ घाट आज हम सब एकसाथ।

मैदागिन स्थित पराड़कर स्मृति भवन में काशी विचार मंच के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉक्टर राजेन्द्र सिंह ने कि आज देश की प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी संवेदनहीन हो गई है। इसकी संवेदनहीनता गंगा की स्थिति बिगाड़ने में काफी हद तक जिम्मेदार है। इन दोनों की संवेदनहीनता ने काशी में गंगा की धारा में अवरोध उत्पन्न करने का कार्य किया है। आज इस बात पर मंथन की जरूरत है कि कैसे गंगा की धारा को मोड़ने से रोका जाए। काशीमें आज गंगा की धारा में ठहराव है। यही स्थिति रही तो देर-सबेर गंगा उस पार की रेत गंगा के घाटों की ओर आ जायेगी।

काशी में गंगा का अर्ध चंद्राकार रूप रेत में तब्दील हो जाएगा। ऐसी स्थितिमें गंगा के उस पार बन रहा नहर भीनहीं टिकेगा। गंगा की धारा में आ रहे अवरोध को समाप्त करने के लिए गंगा में ललिता घाट पर बन रहा प्लेटफार्म समाप्त करना होगा। जल पुरुष ने कहा कि आज भी भागीरथी से उत्तरकाशी तक गंगा का अविरल प्रवाह है। यह पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंहकी देन है। सत्ता ने हमारी बातें नहीं सुनीं लेकिन प्रकृति ने जनवरी 2021 में गंगा के अवरोध के लिए जिम्मेदार प्रोजेक्ट को तोड़ दिया। आज हम राजनीतिक व धार्मिक नारों से ऊपर उठकर मां गंगा की अविरलता के रास्ते कैसे तय हों, यह मिलकर निश्चित करें। इसके लिए कार्यक्रम बनाये जाने चाहिए।

विशिष्ट वक्ता संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो.विश्वम्भरनाथ मिश्र ने कहा कि 14 जून 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने काशी में गंगा के पांच किमी की दूरी का महत्व समझा। पहला प्रोजेक्ट यहां लागू किया। उन्होंने काशी को मॉडल के रूप में पेश किया। बनारस आज आर्टि फिशियल शहर बन गया है। गंगा के भीतर 30 मीटर घुस कर ललिता घाट का प्लेटफार्म बना दिया गया। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि ललिता घाट से दशाश्वमेध घाट का क्षेत्र रेत में बदल जायेगा। उन्होंने गंगा में आई काई पर प्रशासन द्वारा मीरजापुर एसटीपी को दोष देने को आड़े हाथ लिया कहा कि गंगा के उसपार बन रहा नहर गंगा की प्रकृति के लिए खतरनाक साबित होगा। नहर की वजह से असि और तुलसीघाट पर रेत ज्यादा एकत्रित होगी। गंगा का कटान बढ़ेगा। गंगा घाटों को छोड़ देगी ।उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असि नदीको नगवा में शिफ्ट कर देना खतरनाक साबित हो रहा है।सभी नदियों से नहरें निकली हैं लेकिन गंगाको काटना नहर निकालना वर्जित है।

इतिहासकार डॉक्टर मोहम्मद आरिफ ने कहा कि गंगा नदी का नाम नहीं बल्कि तहजीब का नाम है। गंगा का पूरा किनारा विभिन्न संस्कृतियों व तहजीब का पोषक है। गंगा इसलिए साफ हैं कि हर धर्म के व्यक्ति का जुड़ाव गंगा से है। मुगलों की रसोई का खाना गंगा जल से बनता था। मन साफ होगा तब गंगा साफ होगी। गंगा के लिए जन आंदोलन चलाना पड़ेगा। हरिद्वार में गंगा बहुत साफ है लेकिन जब हम आगे बढ़ते हैं तो विकास की यात्रा में गंगा प्रदूषित हो गयी। उन्होंने कहा कि सभी नदियों से नहरें निकली हैं लेकिन गंगाको काटना या नहर निकालना वर्जित है।

अध्यक्षीय संबोधन में कबीर मठ के आचार्य विवेक दास ने कहा कि गंगा हमारी आस्था का केंद्र है। कबीर व रैदास ने गंगा को महत्व प्रदान किया। जब संत रविदास कठौती में गंगा ला सकते हैं तो हम भी गंगा को बचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पूरी संत परम्परा गंगा से प्रभावित है। गंगा का सवाल तबतक बना रहेगा जबतक जनता जागरूक नहीं होती। संचालन व विषय स्थापना व्योमेश शुक्ल ने की।

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