Good News : वाराणसी में ईरी तैयार कर रहा शुगर फ्री चावल, 800 प्रजातियों पर शोध

दूसरे को चावल खाते देख जी और मचलता है लेकिन मजबूरी में देखकर ही सब्र करना पड़ता है। हालांकि वाराणसी स्थित ईरी (अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान) के सार्क (दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र) में शुगर के मरीजों को खाने वाली धान की प्रजातियों पर परीक्षण चल रहा है।

Abhishek SharmaSun, 24 Oct 2021 05:16 PM (IST)
ईरी के वाराणसी स्थित सार्क ने शुरू किया लो जीआइ वाली धान की प्रजातियों पर परीक्षण।

वाराणसी [मुकेश चंद्र श्रीवास्तव]। किसी व्यक्ति में शुगर की समस्या आते ही कई तरह के खानपान पर रोक सी लग जाती है। खासतौर पर चावल खाने से परहेज करना पड़ जाता है। इसके बाद तो शुगर पीड़ित व्यक्ति को चावल खाने का और मन करने लगता है। दूसरे को चावल खाते देख जी और मचलता है, लेकिन मजबूरी में देखकर ही सब्र करना पड़ता है। हालांकि वाराणसी स्थित ईरी (अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान) के सार्क (दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र) में शुगर के मरीजों को खाने वाली धान की प्रजातियों पर परीक्षण चल रहा है। इसके तहत भारत की लगभग 800 प्राचीनतम, नई प्रजातियों व प्रजनन लाइनों को देशभर से एकत्रित कर परीक्षण किया जा रहा है। इसके साथ ही फिलीपींस से भी कुछ कलेक्शन मंगाए गए हैं, जिसका प्रदर्शन बहुत ही बेहतर पाया गया है।

खाद्य पदार्थाें में कार्बोहाइड्रेट मात्रा मापने की प्रणालि है जीआइ : सफेद चावल आमतौर पर स्टार्च युक्त होता है। दुनिया की अधिकांश आबादी विशेष रूप से एशिया में सफेद चावल दैनिक कैलोरी का प्रमुख स्रोत है। चावल की अधिकांश किस्में उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआइ) की होती हैं। ग्लाइसेमिक इंडेक्स खाद्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा मापने और निर्दिष्टित करने की एक प्रणाली है, जिससे यह ज्ञात होता है कि कोई भी खाद्य पदार्थ रक्त में शर्करा की मात्रा को कितना बढ़ाता/घटाता है।

उच्च जीआइ वाले चावल से बढ़ता है शुगर का स्तर : उच्च जीआइ वाला भोजन शरीर द्वारा आसानी से पच जाता है व अवशोषित हो जाता है, लेकिन यह अक्सर रक्त में शर्करा के स्तर को बढ़ा देता है। इससे मधुमेह होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके विपरीत कम जीआइ वाले भोजन की शरीर में पाचन और अवशोषित होने की दर कम होती है। यानी रक्त में शर्करा का मिश्रण निरंतर लेकिन मंद गति से होता रहता है। इस तरह का भोजन करने से मधुमेह (शुगर) होने की अाशंका कम हो जाती है।

50-52 जीआइ तक की प्रजाति मिलने की उम्मीद : लो जीआइ वाली प्रजाति पर कार्य करने वाले डा. उमा माहेश्वर सिंह बताते हैं कि अभी तक की जांच में बेहतर परिणाम सामने आए हैं। कुछ ऐसी प्रजाति चिन्हित की गई है जिनका जीआइ 50-52 तक मिलने की उम्मीद है। वैसे तो सामान्य तौर पर नई प्रजाति की ब्रीडिंग में 8 से 10 साल का समय लग जाता है। हालांकि यहां पर स्पीड ब्रीडिंग सेंटर भी तैयार किया गया है। इसमें नई प्रजाति की ब्रीडिंग करने में 2-3 साल समय की बचत हो जाएगी। संभावना जताई जा रही है कि आने वाले 5-6 साल में शुगर के रोगियों के लिए भी बेहतर स्वाद व गुणवत्ता युक्त धान की प्रजाति की आम किसानों के बीच में खेती होने लगेगी।

लो जीआइ पर मोहाली व कटक के सहयोग से चल रहा परीक्षण : कम जीआइ आहार टाइप-2, मधुमेह के विकास की आशांक को कम करता है, जो मधुमेह रोगियों में मधुमेह की स्थिति को बेहतर ढंग से नियंत्रित व प्रबंधित करने में उपयोगी है। ईरी सार्क के विज्ञानी कम ग्लिसेमिक इंडेक्स के चावल की प्रजातियों के विकास और संवर्धन के लिए निरंतर अनुसंधान कर रहे हैं। एनएबीआइ मोहाली व एनआरआरआइ कटक के सहयोग से निम्न जीआइ वाले चावल की प्रजातियों का परीक्षण शुरू किया गया है।

बोले अधिकारी : निम्न जीआइ वाले चावल की कुछ किस्में पहले से ही उपलब्ध है। इसमें ललाट, उन्नत सांबा मंसूरी, संपदा व आरएनआर 15048 आदि शामिल है। निम्न जीआइ वाली चावल की ये प्रजातियां मधुमेह रोगियों और मधुमेह के जोखिम वाले लोगों में रक्त में शुगर के स्तर को नियंत्रित रखने में कारगर है व मधुमेह जैसी घातक बीमारी से बचने में मदद करती है। ऐसी प्रजातियों पर यहां शोध चल रहा है। -डा. सुधांशु सिंह, निदेशक, दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र, अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, वाराणसी।

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