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वाराणसी के पंचायतों में अंत्येष्टि स्थल पर मुकम्मल होती व्यवस्था तो गंगा में नहीं दिखती लाशें

वाराणसी में अब तक तीस से अधिक अंत्येष्टि स्थल निर्माण का दावा किया जा रहा है।

अंत्येष्टि स्थल सभी पंचायतों में निर्माण किए जाने की व्यवस्था थी। वित्तीय वर्ष 2014 में इस कार्य के लिए 100 करोड़ रुपये का बजट का प्राविधान भी किया गया था। जिले में अब तक तीस से अधिक अंत्येष्टि स्थल निर्माण का दावा किया जा रहा है।

Saurabh ChakravartySun, 16 May 2021 09:15 AM (IST)

वाराणसी, जेएनएन। पंचायतों में अंत्येष्टि स्थल का निर्माण पिछले सात साल से अनवरत जारी है। सरकार ने भी इस बाबत अच्छी खासी राशि पंचायतों के हवाले की। आला अफसरों ने जहां मानिटरिंग की वहां व्यवस्था अच्छी रही। औपचारिकता का जहां निर्वहन हुआ वहां निर्माण तो हुआ लेकिन पंचायतें उसे संवार नहीं सकी। अंत्येष्टि स्थल सभी पंचायतों में निर्माण किए जाने की व्यवस्था थी। वित्तीय वर्ष 2014 में इस कार्य के लिए 100 करोड़ रुपये का बजट का प्राविधान भी किया गया था।

साथ ही नदियों के किनारे के सभी ग्राम पंचायतों में इसके निर्माण के निर्देश दिए गए। हालांकि लक्ष्य का आवंटन वित्तीय वर्षवार किए गए। प्रारंभिक दौर में 13.23 लाख प्रति अंत्येष्टि पर खर्च किए जाने की व्यवस्था थी, महंगाई को देखते हुए अब 24 लाख रुपये जारी हो रहे हैं। जिले में अब तक तीस से अधिक अंत्येष्टि स्थल निर्माण का दावा किया जा रहा है। हालांकि इसमें से कुछ वर्ष 2014 के पूव्र के भी बताए जा रहे हैं। कुछ चुनिंदा स्थलाें को छोड़े दे तो इसके निर्माण में मानक की बहुत हद तक अनदेखी की गई है। निर्माण होने के बाद कुछ स्थानों पर उपयोग हो रहा है तो कुछ स्थानों पर यूं ही पड़ा है। कहीं टिन सेड का पता नहीं तो कहीं शौचालय के दरवाजे गायब हैं। न पंचायतों ने इसकी सुधि ली न ही गांव में तैनात अफसरों ने। पंचायतें भी इस बात को स्वीकार कर रही है कि अंत्येष्टि स्थल पर सब कुछ व्यवस्थित रहता तो अपादा में हो रही मौत के बाद गंगा नदी में लाशे लोग नहीं प्रवाहित करते।

कुछ यूं कहानी शवदाह स्थल की

जिले में शवदाह की स्थिति का आलम यह है कि दानगंज में गोमती किनारे बने मोहनदासपुर कैथोर अंत्येष्टि स्थल पर बने शौचालय में दरवाजे नहीं हैं। टीन शेड न जाने कब के हवा में उड़ चुके हैं। इसके अलावा भदवां व नियारडीह में भी अंत्येष्टि स्थल बना हुआ है लेकिन इसका उपयोग सिर्फ बाढ़ के दिनों में होता है। शेष दिन में लोग नदी किनारे ही अंतिम संस्कार करते हैं। हरहुआ ब्लाक में कोई अंत्येष्टि स्थल का निर्माण ही प्रस्तावित नहीं हुआ है। शहरी क्षेत्र नजदीक होने के कारण बहुतयात लोग मणिकर्णिका घाट या तो रामेश्वर श्मशान घाट पर शवदाह करते हैं। ब्लाक चिरईगांव के सरायमोहाना, मुस्तफाबाद, व कुकुढ़ा में अंत्येष्टि स्थल है लेकिन इन तय स्थालों की बजाय लोग गंगा किनारे ही शवदाह कर रहे हैं। मुस्तफाबाद में शवदाह स्थल पर गंदगी से पटा हुआ है। बड़ागांव ब्लाक में तीन शवदाह चालू हालत में हैं। इसमें गजापुर, बलुआ व सरावां है। वरुणा किनारे इन शवदाह स्थलों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। सरावां में तो शवयात्रियों के बैठने वाला स्थल भी टूट चुका है। चौबेपुर के गौरा उपरवार, चंद्रावती व कैथी घाट पर अंत्येष्टि स्थल मानक के तहत बना हुआ है। शव यात्रियों के बैठने की व्यवस्था, बाथरूम आदि है हालांकि बाढ़ के समय ही इसका उपयोग होने की बात कही जा रही है। रोहनिया क्षेत्र में बेटावर व मुड़ादेव में बने अंत्येष्टि स्थल का उपयोग हो रहा है। शौचालय, विश्रामालय, टीनशेड, पानी पीने की व्यवस्था आदि है।

गरीबों की लाश जलाने को निश्शुल्क मिलेगी लकड़ी

जिले में कोविड संक्रमण के दौरान हो रही मौत पर रोक लगाने के साथ ही प्रशासन ने अंतिम संस्कार के लिए भी पहल की है। गांव में नदियों के किनारे बने सभी अंत्येष्टि स्थल पर सचिव को गरीबाें के लिए निश्शुल्क लकड़ी की व्यवस्था कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही उक्त पंचायत में गरीबों को अंतिम संस्कार के लिए पंचायत निधि से पांच हजार रुपये भी मुहैया कराने को कहा गया है। यह भी आदेश हुआ है कि कोई भी गरीब पिछले तीन माह में घर के किसी भी सदस्य की मौत पर इस राशि को प्राप्त कर सकता है। इसके लिए सचिव के समक्ष दावा करना होगा।

सात साल में बने अंत्येष्टि स्थल

-आराजीलाइन : अयोध्यापुर शहंशाहपुर

-बड़ागांव : सरांवा, बलुआ, गजापुर

- चिरईगांव : मुस्तफाबाद, कुकुड़ा, सरायमोहाना

-चोलापुर : गौराउपरवार, रामपुर, धौरहरा, चंद्रावती व ढाका

-काशी विद्यापीठ - बेटावर, मुड़ादेव, रमना-पिंडरा -- इंदरपुर, रतनपुर व रामपुर-सेवापुरी - भीटकुरी, राखिनेवादा

 

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