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वाराणसी में दिन भर दर-दर भटका अस्पताल और शाम को 75 वर्षीय हुब्राजी देवी ने तोड़ा दम

जौनपुर के थानागद्दी स्थित चकरामपुर गांव निवासी हुब्राजी देवी

हुब्राजी देवी के निधन के बाद साथ आईं उनकी दो बेटियों और परिवार के ही राजकुमार ने कबीरचौरा अस्पताल के बाहर मौजूद लगभग सभी एम्बुलेंस चालकों से जिरह किया कि मेरी मां को घर तक पहुंचा दें। समाज सेवी अमन कबीर ने एम्बुलेंस से हुब्राजी देवी के शव को पहुंचवाया।

Saurabh ChakravartyFri, 14 May 2021 05:10 AM (IST)

वाराणसी, जेएनएन। आसपास के जिलों से लोग बेहतर इलाज के लिए यहां आते हैं। लेकिन यहां आने के बाद इलाज के अभाव में उनकी दर्दनाक मौत हो जाती है। स्वजनों के पास फिर अफसोस के अलावा और कुछ नहीं बचता। वह शव के पास चीत्कारें मारकर कहते हैं कि हे मृत आत्मा मुझे माफ कर देना। मैं एक दवा भी नहीं खिला सका। कुछ ऐसा ही वाकया हुआ जौनपुर के थानागद्दी स्थित चकरामपुर गांव निवासी हुब्राजी देवी के साथ। करीब एक सप्ताह से उनको बुखार आ रहा था। गांव के डॉक्टरों खूब इलाज किया लेकिन शरीर का तापमान बढ़ता चला गया। स्वजनों ने सोचा कि जितना में जौनपुर जाएंगे उतने में बनारस पहुंच जाएंगे और अच्छा इलाज मिल जाएगा। यही सोचकर वह थानागद्दी से बनारस के लिए निकल पड़े।

यहां एक परिचित ने बताया कि छावनी परिषद में नया कोविड अस्पताल बना है। वहां दिखा लीजिए। वहां पहुंचने पर हुब्राजी देवी का डॉक्टरों ने एंटीजेन किट से कोविड-19 की जांच की पता चला कि वह कोविड पॉजिटिव हैं। डॉक्टरों ने तीन घण्टे अपने पास रखा। उसके बाद स्वजनों से कहा कि किसी दूसरे अस्पताल में ले जाओ। साथ आईं उनकी दो बेटियां संगीता और राधिका के हाथ जोड़कर कर गिड़गिड़ाने पर डॉक्टरों ने पं. दीनदयाल उपाध्याय जिला अस्पताल का हेल्पलाइन नंबर देकर अपना पिंड छुड़ा लिया। हेल्पलाइन पर संपर्क करने पर वहां के डॉक्टरों ने मंडलीय अस्पताल कबीरचौरा ले जाने के लिए कहा। उसके बाद छावनी अस्पताल के डॉक्टरों ने 250 रुपये जमा करने पर एम्बुलेंस से मंडलीय अस्पताल छोड़वा दिया। वहां पहुंचने पर इमरजेंसी में डॉक्टरों को दिखाया तो उन्होंने भी कहा कि बीएचयू ले जाओ। यहां सुविधा नहीं है। इधर मरीज हुब्राजी देवी की हालत बिगड़ती चली गई। अस्पताल दर अस्पताल भटकने के चक्कर में हुब्राजी देवी का प्राण निकल गया।

घर पहुंचाने के लिए नहीं तैयार हुआ कोई एम्बुलेंस

हुब्राजी देवी के निधन के बाद साथ आईं उनकी दो बेटियों और परिवार के ही राजकुमार ने कबीरचौरा अस्पताल के बाहर मौजूद लगभग सभी एम्बुलेंस चालकों से जिरह किया कि मेरी मां को घर तक पहुंचा दें। लेकिन किसी ने उनकी विनती नहीं सुनीं। हार मानते हुए वह शव के पास बैठी रहीं। तब तक वहां बैठकर सारे वाकये को देख रहे समाज सेवी अमन कबीर के एक मित्र ने उन्हें फोन करके सूचना दिया। उन्होंने अपने एम्बुलेंस से हुब्राजी देवी के शव और उनके स्वजनों को गंतव्य तक पहुंचवाया। देर शाम हुब्राजी देवी का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

 

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