सोनभद्र में मां के चढ़ावे से संवर रहा गरीब कन्याओं का भविष्य, आदिवासी व दलित समाज के परिवारों को विशेष तरजीह

डाला स्थित मां वैष्णों शक्तिपीठ धाम। यह मंदिर आस्था के साथ-साथ अपने सामाजिक सरोकारों के लिए भी जाना-पहचाना जाता है।

सोनभद्र के डाला स्थित मां वैष्णों शक्तिपीठ धाम। यह मंदिर आस्था के साथ-साथ अपने सामाजिक सरोकारों के लिए भी जाना-पहचाना जाता है। पिछले 17 वर्षों से आसपास के क्षेत्रों में होेने वाले सामूहिक वैवाहिक कार्यक्रमों में मंदिर प्रशासन दिल खोलकर दान करता है।

Saurabh ChakravartyMon, 19 Apr 2021 06:10 AM (IST)

सोनभद्र, जेएनएन। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड व बिहार के भक्तों के भक्ति एवं श्रद्धा का केंद्र है डाला स्थित मां वैष्णों शक्तिपीठ धाम। यह मंदिर आस्था के साथ-साथ अपने सामाजिक सरोकारों के लिए भी जाना-पहचाना जाता है। पिछले 17 वर्षों से आसपास के क्षेत्रों में होेने वाले सामूहिक वैवाहिक कार्यक्रमों में मंदिर प्रशासन दिल खोलकर दान करता है। आदिवासी बाहुल्य जिला होने के कारण इस वर्ग को विशेष तरजीह दी जाती है। इसके लिए दलित व पिछड़े परिवारों की बेटियों की शादी में भी धन व धान्य से भी मंदिर प्रशासन मदद करता है। इसके अलावा मां वैष्णों को चढ़ावा के रूप में मिले साड़ी, चुनरी व श्रंगार के समानों को भी भेंट दिया जाता है।

सोनांचल के शक्तिपीठ में शामिल मां वैष्णों धाम की वही मान्यता है, जो जम्मू स्थित माता रानी की है। 17 वर्ष पूर्व 2004 में जम्मू के कटरा स्थित मां वैष्णो देवी से 10 भक्तो ने 10 दिन में अखण्ड ज्योति लाकर यहां पर स्थापित किया था। तब से लेकर आज तक यह अखंड ज्योति जल रही है। वर्ष 2002 में मंदिर निर्माण की पड़ी नींव जो 30 माह में बनकर तैयार हो गई थी। मूर्ति स्थापना से पूर्व ढाई हजार महिला श्रद्धालुओं ने सात किमी की दूरी तय कर सोन नदी से कलश में जलभर कर लाया था। तब से लेकर आजतक माता रानी के चरणों में भक्तों द्वारा चढ़ावा के रूप में मिलने वाला चुनरी, साड़ी व नाना प्रकार के श्रंगार के सामानों को एकत्र कर मंदिर प्रांगण हो या क्षेत्र में होने वाले गरीब कन्याओं के विवाह में आशीवार्द के रूप में बांटा जाता है। जिसे लोग शुभ मानते हुए खुशी से ग्रहण करते हैं। फिलहाल कोरोना काल के कारण अन्नपूर्णा भंडारा बंद है।

सामाजिक परोपकार की मिसाल है मंदिर

शक्ति की देवी मां वैष्णों शक्तिपीठ धाम संचालक अग्रवाल धर्मार्थ समिति के अध्यक्ष सुभाष मित्तल बताते हैं कि जाति-पाति, अमीर-गरीब के भेदभाव का यहां कोई जगह नहीं है। सभी को यहां पर एक नजर से देखा जाता है। मंदिर प्रशासन अब तक हजारों ऐसे शादी समारोह करा चुका है। ऐसे शादियों में मंदिर में चढ़े चढ़ावे के अलावा आवश्यकता अनुसार आर्थिक मदद भी जाती है।

 

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