ठुमरी सम्राट की स्मृति में दो दिवसीय संगीत समाराेह 27 नवंबर से, सुबह-ए-बनारस के मंच से सांझ को बिखरेंगी संगीत की लहरियां

शनिवार और रविवार की शाम गुनगुनाएगा पूरा बनारस जब अस्सी घाट स्थित सुबह-ए-बनारस के मंच पर सांझ को आयोजित होगा संगीत समारोह। गुरुवार को रामापुरा स्थित पं. महादेव प्रसाद मिश्र संगीत संस्थान में आयोजित प्रेस वार्ता में यह जानकारी दी संगीताचार्य प्रीतीश ने।

Saurabh ChakravartyThu, 25 Nov 2021 09:22 PM (IST)
रामापुरा स्थित पं. महादेव प्रसाद मिश्र संगीत संस्थान में आयोजित प्रेस वार्ता में यह जानकारी दी संगीताचार्य प्रीतीश ने।

जागरण संवाददाता, वाराणसी : ठुमरी सम्राट पं. महादेव प्रसाद मिश्र संगीत की दुनिया के अप्रतिम गुरु थे। उनकी शिष्य परंपरा में देश की अनेक महान हस्तियां शामिल हैं। बावजूद इसके वह आत्मविज्ञान के नहीं बल्कि आत्माभिव्यक्ति के संगीतकार बनकर रहना पसंद करते थे। यही कारण है कि इस महान संगीतकार के योगदान का असीम मूल्यांकन आज तक ठीक ढंग से नहीं किया जा सका है। उनकी महान स्मृति में इस बार शनिवार और रविवार की शाम गुनगुनाएगा पूरा बनारस, जब अस्सी घाट स्थित सुबह-ए-बनारस के मंच पर सांझ को आयोजित होगा संगीत समारोह। गुरुवार को रामापुरा स्थित पं. महादेव प्रसाद मिश्र संगीत संस्थान में आयोजित प्रेस वार्ता में यह जानकारी दी संगीताचार्य प्रीतीश ने।

उन्होंने बताया कि यह आयोजन संस्थान एवं संस्कृति विभाग के तत्वावधान में किया जा रहा है। इसमें बतौर मुख्य अतिथि विदेश एवं संस्कृति राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी और विशिष्ट अतिथि प्रदेश के संस्कृति पर्यटन, धर्मार्थ व प्रोटोकाल मंत्री डा. नीलकंठ तिवारी उपस्थित रहेंगे। मंच पर पहले दिन संस्थान के शिष्यों के समूह गायन व शुभ मिश्र व स्वरांश मिश्र के गायन से समारोह का शुभारंभ होगा। सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक पं. राजेंद्र प्रसन्ना का बांसुरी वादन, पं. गणेश प्रसाद मिश्र का गायन, शिवांग मिश्र व अभिषेक मिश्र का सितार वादन व सौरव-गौरव मिश्र का कथक होगा। दूसरे दिन यशिका देववंशी के कथक से आरंभ कार्यक्रम में डा. राकेश कुमार का बांसुरी वादन, कोलकाता की अवंतिका चक्रवर्ती का गायन व पं. नरेंद्र मिश्र का सितार वादन होगा।

संस्थान के महामंत्री व समारोह के संयोजक, ठुमरी सम्राट के सुपुत्र पं.गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि पं. महादेव प्रसाद मिश्र की शिष्य परंपरा में देश भारत रत्न सुब्बुलक्ष्मी से लेकर तमाम कलाकार रहे। उनकी विशेषता यह कि वह गायन के साथ वादन भी सिखाते थे। बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया के वह दादागुरु रहे हैं तो खुद ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी ने उन्हें बताया था कि वह भी उनकी शिष्या रही हैं। वह कला को धनार्जन का माध्यम बनाने के विरुद्ध थे। अपनी परंपराओं को सहेजने, समृद्ध व संरक्षित करने के लिए उन्होंने 70 वर्ष की अवस्था में ख्याल गायन छोड़ दिया और केवल ठुुमरी गायन करते हुए ठुमरी सम्राट कहलाए। इसके अलावा राग भैरवी व दादरा में पूरब शैली गायन में उनके विविध प्रयोगों ने इस कला को ऊंचाइयों तक पहुंचाया और नया आयाम दिया।

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