दीप ज्योति पर्व में अबकी मिट्टी की झालर-झूमर, वाराणसी में 300 करोड़ रुपये का बाजार जता रहे स्वदेशी से प्यार

उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था में बनारस की खास अहमियत है। यहां छोटे त्योहारों पर भी अच्छी खासी खरीदारी होती है फिर दिवाली का क्या कहना। इस बार भी बड़ीपियरी समेत बनारस के अन्य झालर बाजार लगभग 300 करोड़ रुपये की खरीद-बिक्री के लिए सज गए हैं।

Saurabh ChakravartyTue, 26 Oct 2021 07:20 AM (IST)
विभिन्न आकार-प्रकार के दीये तैयार करने में जुटे कुम्हार

जागरण संवाददाता, वाराणसी। उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था में बनारस की खास अहमियत है। यहां छोटे त्योहारों पर भी अच्छी खासी खरीदारी होती है फिर दिवाली का क्या कहना। इस बार भी बड़ीपियरी समेत बनारस के अन्य झालर बाजार लगभग 300 करोड़ रुपये की खरीद-बिक्री के लिए सज गए हैं। इतने बड़े बाजार में चाइनीज झालरों को स्वदेश निर्मित हैंडमेड आकर्षक उत्पादों ने बड़ी चुनौती दी है। इसमें मिट्टी के झालर-झूमर लोगों को अधिक आकर्षित कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वोकल फार लोकल के आह्वान ने इस कारोबार में जान भर दी है। लोगों की मांग और पसंद का ही असर है कि हजारों इलेक्ट्रिक चाकों पर लगभग 20 लाख विभिन्न प्रकार के मिट्टी के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। वह भी विभिन्न डिजाइनों से युक्त। मैजिक दीप, शंख दीप, कछुआ दीप, झालर, झूमर, दीया, घंटी, घडिय़ा, मूर्ति लक्ष्मी-गणेश तैयार किए जा रहे हैं।

स्वदेशी हैंडमेड झालरों का बनारस बना हब

इलेक्ट्रानिक बाजार पर चीन की बादशाहत अब कमजोर पडऩे लगी है। इसका उदाहरण है कि बनारस में हैंडमेड आकर्षक झालरों का बड़ी मात्रा में निर्माण और उसकी मांग। यहां से करोड़ों रुपये की झालर बिहार, झारखंड, उड़ीसा तक भेजी जा रही है।

बाजार में छाई बहुरंगी स्वदेशी झालर

मुख्य रूप से हैंडमेड पिक्सल बोर्ड, पिक्सल झरना, पिक्सल पंखी, एलईडी, रिंग, पिक्सल पट्टा, स्टिप रिंग आदि की मांग है। इसमें दो रंगों से लेकर बहुरंगी स्वदेशी झालरों को लोग पसंद कर रहे हैं। कुछ तो ऐसे दीये बाजार में उपलब्ध हैं जिसके चिराग तले ऊं और स्वास्तिक के चित्र उभर रहे हैं। इसे लेकर ग्राहकों में उत्साह है।

सस्ता नहीं टिकाऊ है ग्राहकों की पसंद

चाइनीज सामानों को लेकर ग्राहकों में अब धारणा बदली है। पहले ग्राहक जहां सस्ता चाइनीज सामानों को पसंद करते थे अब टिकाऊ सामान पर ज्यादा ध्यान जा रहा है। स्वदेशी उत्पाद ज्यादातर कापर युक्त हैं। असेंबङ्क्षलग की जा रही है। इसमें यूज एंड थ्रो की स्थिति नहीं है बल्कि खराब होने पर पुन: बनाया जा सकता है। ऐसे में महंगे स्वदेशी झालर होने के बाद भी ग्राहक अधिक पसंद कर रहे हैं। दुकानों पर चाइनीज झालर अधिकांशत: पुराने ही हैं।

बोले कारीगर और व्यापारी

स्वदेशी सामानों की मांग बढ़ रही है। जैसे-जैसे दिवाली नजदीक आती जाएगी वैसे ही झालरों की बिक्री तेजी से बढ़ेगी। बनारस में कई राज्यों के लोग बड़ी संख्या में खरीदारी करने के लिए आते हैं।

- गौरव यादव, बड़ी पियरी।

चीनी सजावटी सामान के बहिष्कार के बाद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों की बदौलत मिट्टी के उत्पादों के प्रति लोगों का नजरिया बदला है। मांग और पसंद के मुताबिक सामान बनाए जा रहे हैं।

बिहारी लाल प्रजापति, सेवापुरी।

दीयों की मांग इतनी है कि बनाना मुश्किल हो रहा है। हमारे यहां ही एक लाख दीयों की मांग है। विभिन्न प्रकार के दीये दिनों रात बनाए जा रहे हैं। इसमें झालर, झूमर, शंख, दीया आदि का निर्माण किया जा रहा है।

रामकिशुन प्रजापति, काशी विद्यापीठ।

गांव के कुम्हार स्थानीय स्तर पर अधिक मांग के चलते मिट्टी के दीये और अन्य सामान बिक्री कर दे रहे हैं। इसके साथ मडुआडीह थाने के सामने और लक्ष्मी पैलेस में पयकारों को बेचते हैं।

विनोद प्रजापति, काशी विद्यापीठ।

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