वाराणसी में गंगा घाट पर सैकड़ों गगनदीप जलेंगे उनके नाम जिन्होंने खून से कर्ज चुकाया देश की माटी का

काशी में दिव्य कार्तिक मास के पहले दिन से ही अपने पुरखों के अनंत यात्रा पथ को दीपों से आलोकित करने की एक भावनात्मक रस्म निभाई जाती रही है। नदियों के किनारे सरोवरों के तट पर या फिर घर की छत पर आकाशदीप की यह झांकी सजाई जाती रही है।

Saurabh ChakravartyWed, 20 Oct 2021 09:40 PM (IST)
पीएसी बैैंड की धुन के बीच देश के भीतर सुरक्षा में लगे वीर जवानों के नाम आकाशदीप जलाए गए ।

वाराणसी, कुमार अजय। उनके गौरवमय बलिदान की शेष स्मृतियों के स्मरण से निश्चित ही भींगी होंगी गंगा तट पर पंक्ति में खड़े गोरखा ट्रेनिंग सेंटर के कड़ियल जवानों की पलकें। किंतु यह भी गारंटी कि उन वीरों की शहादतों के गुरूर से हर सैनिक के सीने चौड़े, गर्दनें तनी होंगी। दिलो-दिमाग को झकझोरती यादों की आंधी में बस कौंध रहा होगा एक ही दृश्य सरहद का। जब शत्रुओं का दलन कर रहे हमारे अमर जवानों की सीधे मौत से बिल्कुल आमने-सामने आ ठनी होगी। यह जोशीला नजारा गुरुवार की शाम गोधूलि बेला में आकार लेगा गंगा किनारे प्रशस्त दशाश्वमेघ घाट पर। जहां गुरुवार से ही शुरू हो रहे दिव्य कार्तिक मास से पहले दिन कड़क-तड़क सैल्यूट के साथ ट्रूप का हर जवान अफसरों की अगुवाई में अपने दिवंगत नायकों के नाम का आकाशदीप जलाएगा और हर दीप झिर्रियों के सहारे बांस की पीटारी को जगमग करता स्तंभ की फुनकी पर पहुंचकर चमकते तारों की बारात का हिस्सा बन जाएगा। वर्ष 1999 से ही देश की आन की खातिर शहीद हो गए भारतीय सेना के जवानों के नाम समर्पित कर दिए गए आकाशदीप जलाने की परंपरा अब सिर्फ परिपाटी नहीं, काशीवासियों के लिए एक राष्ट्रीय नमन पर्व है। उनका गुमान है, गुरूर है, उनका गर्व है।

काशी में दिव्य कार्तिक मास के पहले दिन से ही अपने पुरखों के अनंत यात्रा पथ को दीपों से आलोकित करने की एक भावनात्मक रस्म निभाई जाती रही है। नदियों के किनारे, सरोवरों के तट पर या फिर घर की छत पर, आकाशदीप की यह झांकी सजाई जाती रही है। कार्तिक के प्रथम दिवस से शुरू होकर देव दीपावली उत्सव (कार्तिक पूर्णिमा) तक दीप जलाने की परंपरा के यात्रावृत्त का सिरा सीधा पौराणिक आख्यानों से जाकर जुड़ता है। अलबत्ता इसे शहीदी पर्व के रूप में ढ़ालने का श्रेय पथ कारगिल युद्ध के बाद इसे देशप्रेम से ओतप्रोत एक अवसर के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले गंगा पुत्र स्वर्गीय सत्येंद्र कुमार मिश्र (मुन्नन महाराज) के भगीरथ प्रयासों की ओर मुड़ता है। संस्था के वर्तमान अध्यक्ष तथा मुन्नन महाराज के उत्तराधिकारी सुशांत मिश्र कहते हैं 'बीते 22 वर्षों से चला आ रहा यह आयोजन अब दो दशक पुराना एक रिवाज बन गया है। अपनी भावप्रण प्रस्तुति से बनारस वालों के लिए एक जज्बाती अंदाज बन गया है'। अनुष्ठान की तैयारियों में जुटे सुशांत कहते हैं हम सबका प्रयास है कि देव दीपावली उत्सव की तरह ही इस मास पार्यंतिक आयोजन को भी राष्ट्रीय फलक मिले, इसे इतने भावभीने अंदाज में मनाया जाए कि आंखों में बिजलियों की कौंध हो। आंख खुले तो भीगी-भीगी हर पलक मिले।

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