top menutop menutop menu

Happy Eid-ul-Fitr 2020: वाराणसी में ईद पर घरों में ही नमाज अदा, कोरोनावायरस से मुक्ति के लिए दुआ

वाराणसी, जेएनएन। लॉकडाउन ने भले ही ईद को फीका कर दिया है लेकिन इस खास दिन का महत्‍व कम नहीं हुआ है। कारण कि वाराणसी सहित पूरे पूर्वांचल में रमजान खत्‍म होते ही सोमवार को घरो में ईद का त्‍योहार मनाया गया है। कोरोना संक्रमण की वजह से लोग एक-दूसरे से गले मिलने से भी बचते रहे। इसके अलावा घर पर ही नमाज पढ़ रहे हैं और अमन चैन व कोरोना से मुक्ति की दुआं मांगी। वाराणसी सहित बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ में भी ईद की रौनक फीकी दिखी।

सोमवार को ईद-उल-फित्र का त्योहार देशभर में जोश-ओ-खरोश संग मनाया गया। उत्साह की रवानी वही रही, मुबारकबाद देने का सिलसिला भी खूब चला। मगर इन सब के बीच फासलों का भी ख्याल रखा गया, ताकि कोरोना की जंग किसी भी सूरत में कमजोर न पडऩे पाए। रही सही कमी डिजिटल माध्यमों ने पूरी कर दी। ईद के मौके पर कोरोना के कारण जो लोग दोस्तों, रिश्तेदारों से मिलने नहीं पहुंच सके, वे सोशल मीडिया के माध्यम से एक-दूसरे की खुशियों में शरीक हुए।

ईद उल फित्र की नमाज सुबह घर-घर में अदा की गई। ईदगाह का रुख करने की बजाय लोग घरों में ही रहे और नमाज अदा करने के बाद कोरोना महामारी से निजात और मुल्क की तरक्की व अमनो-आमान की दुआएं मांगी। रमजान के 30 रोजे मुकम्मल करने वाले रोजेदारों के चेहरों पर ईद की खुशी साफ झलक रही थी। अलसुबह फज्र के समय ही लोग जग गए और नहा-धो कर तैयार होने लगे। कोरोना संक्रमण के बीच नए कपड़ों की बजाय पुराने साफ-सुथरे कपड़े पहन कर बच्चों से लेकर बड़े तक तैयार हो गए। अजान के बाद घरों में ही फज्र की नमाज अदा की गई। इसके बाद सुबह 6:30 बजे से लेकर 10 बजे के बीच लोगों ने ईद-उल-फित्र की नमाज (नमाजे चाश्त) अदा की। उधर, मस्जिदों व ईदगाहों में निर्धारित समय पर इमाम ने तीन-चार नमाजियों संग ईद-उल-फित्र की नमाज अदा रस्म निभाई और मुल्क के हक में दुआएं मांगी। लॉकडाउन के दौरान रमजानुल मुबारक में जिस जज्बे के साथ रोजेदारों ने पास-पड़ोस के जरूरतमंदों की मदद की थी, उसे आगे भी जारी रखने का संकल्प लिया गया।

गाजीपुर में भी ईद का पर्व सादगी पूर्ण ढंग से मनाया जा रहा है। भांवरकोल क्षेत्र के फखनपुरा में ईद उल फितर के अवसर पर पुलिस कर्मी तैनात कर दिए गए हैं। हालांकि ईदगाह सुनसान दिख रहे हैं। मुस्लिम भाइयों ने अपने-अपने घरों में ईद की नमाज पढ़ी। लगभग सभी गांवों में पुलिस चक्रमण करती रही। आजमगढ़ में भी लोगों ने ईद की खुशियां मनाईं लेकिन लाॅकडाउन के कारण इस बार तरीका कुछ अलग दिखा। ईदगाहों में ताला लगा रहा और लोगों ने घरों में ही नमाज अदा की। कहीं-कहीं गांव की मस्जिद में नमाज तो हुई लेकिन प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के अनुसार उसमें चार लोग से ज्यादा शामिल नहीं हुए। नमाज के बाद परिवार समेत आसपास के लोगों को ईद की बधाइयां दी गईं। दावतों का दौर शुरू हुआ लेकिन बहुत खास लोग ही उसमें शामिल हुए। बच्चे अपने दोस्तों के घर मिलने पहुंचे लेकिन मेले का आनंद नहीं मिल सका।

ईद का धार्मिक पक्ष

प्रमुख इस्लामिक विद्धान मौलाना साकीबुल कादरी के मुताबिक ईद रमजान की कामयाबी का तोहफा है। नबी का कौल है कि रब ने माहे रमजान का रोजा रखने वालों के लिए जिंदगी में ईद और आखिरत में जन्नत का तोहफा मुकर्रर कर रखा है। यानी रमजान में जिसने रोजा रखा, इबादत की और नबी के बताए रास्तों पर चला है, तो उसके लिए ईद एक तोहफा है।

खुशियां बांटने का देता है पैगाम

आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी पर रिसर्च करने वाले प्रमुख उलमा मौलाना डा. शफीक अजमल की मानें तो ईद का मतलब केवल यह नहीं कि महीनेभर इबादत करके नेकियों की जो पूंजी जमा की उसे बुरे व बेहूदा कामों में बर्बाद न करें, बल्कि ईद का मतलब है दूसरों में खुशियां बांटना। यह पूरी इंसानियत के लिए मुश्किल वक्त है। पास-पड़ोस में नजर रखें। कोई भूखा तो नहीं, किसी के पास पैसों की तंगी तो नहीं, कोई ऐसा बच्चा जिसके पास खेलने के लिए कोई खिलौना न हो आदि बातें मौजूद हैं तो उन लोगों की मदद करना हर किसी का फर्ज है। दूसरों की मदद करना ईद का सबसे बड़ा मकसद है। तभी तो रमजान में जकात, फितरा, सदका निकालने का हुक्म है, ताकि कोई गरीब, मिसकीन, यतीम, बेवा, फकीर नए कपड़ों व ईद की खुशी से महरूम न रह जाए।

परहेजगारी अपनाने का नाम है ईद

उलमा-ए-कराम के मुताबिक नए कपड़े पहनना या खुशबू लगाने का नहीं, बल्कि परहेजगारी अपनाने का नाम ईद है। अल्लाह उस बंदे की दुआ कुबूल नहीं करता जो दिलों में किसी के लिए नफरत व ईष्र्या रखता हो। अल्लाह ने हमें माफ कर दिया, मगर क्या हम एक-दूसरे को माफ कर पाए हैं। जब हम एक-दूसरे को माफ करेंगे, तो अल्लाह हमारे आमाल को कुबूल करेगा। रमजानुल मुबारक में जिस जज्बे के साथ परवरदिगार की इबादत की गई और गरीबों-यतीमों की मदद हुई, उसे बरकरार रखने की जरूरत है। परवरदिगार इंसानों की मदद करने वालों को पसंद करता है और उनकी दुआओं को कुबूल फरमाता है।

इस्तकबाल का बदला तौर-तरीका

ईद की नमाज के बाद एक-दूसरे के यहां लजीज सेंवईयों की दावत का रिवाज है। लॉकडाउन के कारण इस वर्ष मिलने-मिलाने और इस्तकबाल के तौर-तरीकों में तब्दीली आई। लोगों ने दूर-दराज के परिचितों के यहां जाने से परहेज किया। मोहल्ले व पास-पड़ोस के चुनिंदा लोगों के यहां लोग सेंवई की दावत पर पहुंचे। गले मिलकर मुबारकबाद देने की बजाय दूर से ही सलाम-दुआ हुआ। फासला बरकरार रखते हुए लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाया गया।

इन उलमा ने अदा कराई नमाज

मस्जिद इमाम अबू हनीफा अमानुल्लाहपुरा में मुफ्ती-ए-बनारस मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी, मस्जिद ज्ञानवापी में मौलाना जुनैद अहमद, ईदगाह पुराना पुल में मौलाना शकील अहमद, मस्जिद खुदाबख्श जायसी लंगड़े हाफिज में मौलाना जकीउल्लाह असदुल कादरी, उस्मानपुरा जामा मस्जिद में मौलाना हारुन रशीद नक्शबंदी, मस्जिद लाट सरैंया में मौलाना जियाउर्रहमान, जामा मस्जिद नदेसर में मौलाना मजहरुल हक, मस्जिद खरबूजा शहीद में हाफिज शकील अहमद, ढाई कंगूरा मस्जिद चौहट्टा लाल खां में हाफिज नसीम अहमद बशीरी, मदनपुरा व सदर इमामबाड़ा सरैंया में मौलाना मुहम्मद जफर हुसैनी, पितरकुंडा व जामा मस्जिद दारानगर में मौलाना अमीन हैदर, ईमानिया अरबी कालेज मुकीमगंज में मौलाना मोहम्मद बाकर ने नमाज अदा कराई। परीक्षा की इस घड़ी में प्रशासन का सहयोग करते हुए इमाम के अलावा केवल चार अन्य नमाजी ही इसमें शामिल हुए। बाकी लोगों ने अपने-अपने घरों में ही रहकर नमाज अदा की।

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.