चंदौली के हाजी की बनारसी साडिय़ों की विदेश में भी डिमांड, 250 लोगों को दिया रोजगार

हाजी बाबू ने रोजगार को बढ़ावा देने के लिए समिति बनाई है।

चंदौली के हाजी बाबू अपने हुनर से कारखाने में 50 हजार रुपये कीमत तक की बनारसी साडिय़ां तैयार कर रहे। इसके लिए उन्हें बड़े व्यापारियों से सीधे आर्डर मिलता है। हाजी बाबू ने रोजगार को बढ़ावा देने के लिए समिति बनाई है। इससे 250 लोग जुड़े हुए हैं।

Saurabh ChakravartySat, 27 Mar 2021 09:00 PM (IST)

चंदौली, जेएनएन। काला चावल के लिए मशहूर जिला अब बेशकीमती बनारसी साडिय़ों के लिए भी जाना जाने लगा है। यहां की बनी साड़ी की देश-विदेश में डिमांड है। हाजी बाबू अपने हुनर से कारखाने में 50 हजार रुपये कीमत तक की बनारसी साडिय़ां तैयार कर रहे। इसके लिए उन्हें बड़े व्यापारियों से सीधे आर्डर मिलता है। बनारसी साड़ी को मिले भौगोलिक सांकेतक का इस्तेमाल करने वाला जिले का यह एक मात्र पंजीकृत कारखाना है। कोरोना काल में मंद पड़े धंधे के दोबारा परवान चढऩे की उम्मीद है।

हाजी बाबू ने रोजगार को बढ़ावा देने के लिए समिति बनाई है। इससे 250 लोग जुड़े हुए हैं। इसमें बनारसी साड़ी की बुनाई में माहिर एक से बढ़कर एक हुनरमंद हैं। चाहे सोने-चांदी के तारों से साड़ी की बुनाई करनी हो या रेशम व मरमरी सिल्क से साड़ी तैयार करने का काम हो, कारखाने के सभी कामगार इसमें माहिर हैं। हाथ की सफाई ऐसी कि देखने वाले साड़ी की खूबसूरती को निहारते ही रह जाएं। गुणवत्ता का ही नतीजा है कि बड़े-बड़े व्यापारियों से बनारसी साडिय़ों के आर्डर मिलते हैं। उन्होंने बताया कि समिति के माध्यम से 250 लोगों को रोजगार मिलता है। एक साड़ी बनाने में 15 से 25 दिन तक लगता है। साड़ी की क्वालिटी के अनुसार इसे तैयार करने में और भी समय लग सकता है।

एक दशक पहले बनाया था संसद भवन का परदा

हाजी बाबू का हैंललूम कारखाना उल्लेखनीय कार्यों की वजह से काफी प्रसिद्ध है। करीब एक दशक पहले उन्होंने संसद भवन का परदा बनाया था। बताया जरी, रेशम व कीमती कपड़ों का इस्तेमाल कर परदे का निर्माण किया था। उन्हें पर्दे के लिए पांच लाख का आर्डर मिला था। संसद भवन की नई ईमारत में यदि इस तरह का काम मिला तो पूरा करने का माद्दा रखते हैं।

23 तरह के सिल्क व जरी का इस्तेमाल

हाजी बाबू बताते हैं कि बनारसी साड़ी बनाने में रेशम, मरमरी व जरी समेत 23 तरह के सिल्क का इस्तेमाल होता है। उनके कारखाने में सबसे उम्दा रेशमी सिल्क से अधिकांश साडिय़ां बनती हैं। इसके चलते कीमत भी अधिक होती है। हालांकि कद्रदानों की कमी नहीं है। व्यापारियों के साथ ही लोग खुद भी साड़ी तैयार कराने के लिए आर्डर देकर जाते हैं।

होली पर काम की रहती भरमार

उन्होंने बताया कि कोरोना के चलते धंधे को काफी नुकसान हुआ है। पहले होली पर काम इतना बढ़ जाता था कि समय पर आर्डर पूरा करने की चुनौती रहती थी। कम समय में काम पूरा करने वाले कारीगरों को इनाम दिया जाता था। फिलहाल कारोबार में पुरानी जैसी बात नहीं है। कुछ कामगार रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों की ओर कूच कर गए हैं।

बनारसी साड़ी के जीआइ टैग को इस्तेमाल करने के लिए पंजीकृत जिले का यह एक मात्र कारखाना है

बनारसी साड़ी के जीआइ टैग को इस्तेमाल करने के लिए पंजीकृत जिले का यह एक मात्र कारखाना है। यहां उम्दा साडिय़ां तैयार की जाती हैं। उद्योग विभाग जरी, हैंडलूम व पावरलूम कारोबार को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उद्यमियों व कामगारों को विभागीय योजनाओं का लाभ दिलाया जा रहा है।

- गौरव मिश्र, उपायुक्त, उद्योग

 

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