दीप पर्व श्रृंखला का पहला दीपदान भगवान धन्‍वं‍तरि के नाम, जानिए श्री समृद्धि कामना के पर्व धनतेरस का महत्‍व

वाराणसी, जेएनएन। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का वनवास खत्म कर अयोध्या लौट आने का उत्सव दीपावली महज एक दिनी ज्योति पर्व नहीं, यह नौ त्योहारों की भरी-पूरी पांच दिवसीय उत्सवी श्रृंखला है। इसमें श्रीसमृद्धि के साथ आरोग्य, दीर्घायुष्य और शक्ति की कामना भी समाहित है। मान्यता है कि देव-असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन में निकले 14 प्रमुख रत्नों में धनवंतरि और लक्ष्मी प्रमुख रहीं। ऐसे में पांच दिवसीय प्रकाश पर्व का प्रथम दिन धनतेरस व तीसरा दिन दीपावली भी श्रीसमृद्धि कामना को समर्पित रहता है। पर्व का श्रीगणेश शुभ-लाभ कामना से कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी यानी धन-तेरस पर श्रीसमृद्धि की देवी लक्ष्मी, प्रथम पूज्य गणेश, संपत्ति के कोषाध्यक्ष कुबेर के साथ ही आरोग्य के देवता धनवंतरि की विशेष पूजा के साथ हो जाता है।

धन वैभव और सेहत का लाभ

घरों में गणेश- लक्ष्मी की मूर्ति और स्थिर लक्ष्मी के क्रय (संग्रह) की परंपरा निभाई जाती है। दीपावली के दिन विशेष पूजन के लिए चांदी के बर्तन, स्वर्ण अलंकार या अन्य बर्तनादि का संग्रह भी कर लिए जाते हैैं। इसके साथ ही श्रीहरि के अवतार माने जाने वाले भगवान धनवंतरि की जयंती भी उनका पूजन-वंदन कर मनाई जाती है।वास्तव में हमारे संतों-ऋषियों ने पर्व- उत्सवों का निर्धारण ऋतु अनुसार किए तो इनके जरिए मंगलमय जीवन के संदेश भी दिए। ऐसा सभी धर्म शास्त्रों में दिखता है जिसमें स्वास्थ्य को ही असल धन और स्थिर पूंजी बताया गया है। इसके पीछे एक पूरा दर्शन भी है जिस पर गौर करें तो साफ नजर भी आता है।

तर्क यह कि स्वस्थ रहने पर ही धन संचय और धन का सदुपयोग किया जा सकता है। इसलिए धनतेरस के दिन न सिर्फ धन की देवी लक्ष्मी व संपत्ति के कोषाध्यक्ष कुबेर वरन् आरोग्य के देवता भगवान धनवंतरि की भी विशेष पूजा का विधान किया गया। इस लिहाज से धन त्रयोदशी व धनवंतरि जयंती का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी विशेष महत्व है। यह कुछ उसी तरह है कि जैसे धन से हम सुंदर और सुविधा संपन्न घर बना सकते हैैं लेकिन उसमें प्रेम व प्रसन्नता का वातावरण नहीं ले आ सकते। धन के जरिए भौतिक इच्छाओं की पूर्ति तो की जा सकती है लेकिन प्रेम भाव नहीं भर सकते। ऐसे में समग्र स्वास्थ्य यानी तन मन से स्वस्थ रहना ही सबसे बड़ा धन है और जीवन का उद्देश्य है। खास यह कि हम स्वस्थ ही न होंगे तो हमारे पास चाहे जितना भी धन-वैभव क्यों न हो हम उसका उपभोग-आनंद नहीं उठा सकते।

दीप पर्व श्रृंखला का पहला दीपदान

यदि स्वस्थ हैं तो बिना धन-वैभव भी आनंदानुभूति की जा सकती है। धर्म, साधना, वेदांत, ज्योतिष, आयुर्वेद, योग, आदि सभी शास्त्रों ग्रंथों का प्रयोजन भी यही है। इस लिहाज से ही शास्त्रों में कहा गया है कि धनत्रयोदशी पर जिस घर में साफ-सफाई, स्नान विधान पूर्वक पर्व की प्रतिनिधि देव शक्तियों के समक्ष दीपदान कर आरोग्य नियमों के पालन व धन प्राप्ति के संकल्प लिए जाते हैैं, वहां श्री-समृद्धि व आरोग्य सुख सदा बना रहता है। भगवान धनवंतरि के स्वरूप पर गौर करें तो हाथ में चांदी का अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे। इस कारण धनतेरस पर कलश रूप में बर्तन खरीदने का प्रचलन शुरू हुआ। माना जाता है कि धनतेरस पर गहने, बर्तन आदि की बनी वस्तुएं खरीदने से वर्ष पर्यंत धन का आगमन बना रहता है। इसी दिन शाम को असमय मृत्यु निवारणार्थयमराज को प्रसन्न करने के लिए घर के दरवाजे पर या मंदिर आदि में चार बत्तियों वाला दीपक यमराज के निमित्त जलाते हैं। यह दीप पर्व श्रृंखला का पहला दीपदान होता है। 

पग - पग में बसी कथा भगवान धन्‍वंतरि की

मान्‍यता यह भी है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत का कलश लेकर वह निकले थे, वहकाशी राज के परिवार में काशी की स्‍थापना करने वाले वाले कुल में महाराज धन्‍व की इच्‍छा पर भगवान ने धन्‍वंति के रूप में मानव का अवतार लिया था। काशी में ही धन्‍वंतरि के नाम पर पाैराणिक कूप की भी मान्‍यता है जिसका पानी आयुर्वेदिक महतव का माना जाता है। चिकित्‍सा के रूप में अमरता और उत्‍तम सेहत का पर्याय होने की वजह से चिकित्‍सक भी भगवान धन्‍वंतरि की विशेष पूजा करते हैं। वहीं पास में ही उस पीपल के वृक्ष की भी मान्‍यता है जहां तक्षक नाग संग उनकी शक्ति परीक्षा और जीत भी हुई थी। मान्‍यता यह भी है कि उस पीपल को तक्षक ने जहर से भस्‍म किया तो धन्‍वंतरि ने उसे दोबारा हरा भरा कर दिया। इस तरह काशी और आस पास के क्षेत्रों में आयुर्वेद के जनक भगवान धन्‍वंतरि की पग - पग में कथाएं मौजूद हैं।

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