गंगा दशहरा 20 जून को, वाराणसी में दशाश्‍वमेध घाट पर स्‍नान दान की विशेष मान्‍यता

जेष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन राजा भगीरथ की विशेषता पश्चात से गंगा जी का अवतरण स्वर्ग से धरती पर हुआ था। गंगा जी को सभी नदियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को इस बार गंगा दशहरा 20 जून रविवार को मनाया जाएगा।

Abhishek SharmaTue, 15 Jun 2021 01:31 PM (IST)
शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को इस बार गंगा दशहरा 20 जून रविवार को मनाया जाएगा।

वाराणसी, जेएनएन। भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठी है, धर्म शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक माह के व्रत-त्योहार जयंती की विशेष महिमा है। विशेष कुमार की विशेष तिथियों पर देवी-देवताओं का प्रकट दिवस श्रद्धा भक्ति भाव से मनाए जाने की धार्मिक और पौराणिक परंपरा रही है।

ज्योतिषाचार्य विमल जैन के अनुसार जेष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन राजा भगीरथ की विशेषता पश्चात से गंगा जी का अवतरण स्वर्ग से धरती पर हुआ था। गंगा जी को सभी नदियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को इस बार गंगा दशहरा 20 जून रविवार को विधि विधान पूर्वक मनाया जाएगा। दशमी तिथि 19 जून शनिवार की सायं 6:46 पर लगेगी जो कि अगले दिन 20 जून रविवार को शाम 4:22 तक रहेगी। गंगा दशहरा के पावन पर्व पर गंगा स्नान करने पर 10 जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है।

माता गंगा जी की पंचोपचार व षोडशोपचार पूजा अर्चना करनी चाहिए। पूजा के अंतर्गत 10 प्रकार के फूल अर्पित करके 10 प्रकार के नैवेद्य, 10 प्रकार के ऋतु फल, 10 तांबूल, दशांग धूप के साथ 10 दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। गंगा से संबंधित कथा का श्रवण, श्री गंगा स्तुति एवं श्री गंगा स्‍तोत्र का पाठ करना चाहिए।

मां गंगा का पवित्र पावन मंत्र -ओम नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा

ज्योतिषाचार्य विमल जैन के अनुसार गंगा दशहरा के पर्व पर स्नान ध्यान करने के बाद ब्राह्मणों को दस सेर तिल, दस सेर गेहूं दक्षिणा के साथ दान देने पर जीवन में अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है। आज के दिन रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। गंगा उद्धार से संबंधित कथा का श्रवण एवं श्री गंगा स्तुति श्री गंगा स्त्रोत का पाठ भी किया जाना चाहिए। अपनी दिनचर्या नियमित रखते हुए गंगा दशहरा के पावन पर्व पर दान पुण्‍य फलादायी माना गया है।

गंगा अवतरण कथा : भागीरथ एक प्रतापी राजा थे। अपने पूर्वजों को जीवन मरण के दोष से मुक्त करने तथा गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या प्रारंभ की। गंगा उनकी तपस्या से प्रसन्न हुईं तथा स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गईंं। उन्होंने भागीरथ से कहा कि यदि वे सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरेंगी तो पृथ्वी उनका वेब नहीं सह पाएगी और वह रसातल में चली जाएगी। यह सुनकर भागीरथ सोच में पड़ गए। तब भगीरथ ने भगवान शिव की उपासना शुरू कर दी। संसार के दुखों को हरने वाले भगवान शिव जी प्रसन्न हुए और भागीरथ से वर मांगने को कहा। भागीरथ ने उनसे आपनी बाद कह दी। गंगा जैसे ही स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने लगीं गंगा का गर्व दूर करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें जटाओं में कैद कर लिया। इस पर गंगा ने शिव से माफी मांगी तो एक छोटे से पोखरे में छोड़ दिया वहां से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। युगों युगो तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भागीरथ की कस्टमय साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणी मात्र को जीवनदान ही नहीं देती मुक्ति भी देती है। धार्मिक और पौराणिक मान्यता के अनुसार काशी में दशाश्वमेध घाट गंगा स्नान के पश्चात श्री दशाश्वमेध ईश्वर महादेव के दर्शन पूजन की विशेष महिमा मानी गई है।

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