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Dr. Siali Ram Amrit Ranganathan Birth Anniversary : बीएचयू में विश्व के पहले ग्रंथ वर्गीकरण प्रणाली कोलन का सफल प्रयोग

वाराणसी [हिमांशु अस्थाना]। भारत में लाइब्रेरी साइंस के जनक डा. एसआर रंगनाथन 1945 से 1947 तक बीएचयू के सयाजी राव गायकवाड़ सेंट्रल लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन और लाइब्रेरी साइंस के अध्यक्ष रहते हुए ग्रंथों को क्रमबद्ध व सुव्यवस्थित रखने के स्वनिर्मित सूत्र का पहला सफल प्रयोग यही किया था। डा. रंगनाथन ने 1933 में पुस्तकों का वैज्ञानिक और तार्किक आधार बनाकर कर 'कोलन वर्गीकरण' पद्धति तैयार की, जिसका मद्रास से पहला संस्करण प्रकाशित हुआ। लेकिन जब वह 1945 में बीएचयू के कुलपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुरोध पर विश्वविद्यालय आए तो, यहां की सेंट्रल लाइब्रेरी में पड़े लाखों किताबों पर उन्हें अपनी इस कोलन वर्गीकरण के मॉडल का लागू करने का अवसर मिल गया। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर आज भी बीएचयू की 14 लाख किताबों सहित पूरी दुनिया में पुस्तकों और ग्रंथों का वर्गीकरण किया जा रहा। बीएचयू स्थित केंद्रीय ग्रंथालय के उपग्रंथालयी डा. संजीव सराफ बताते हैं कि डा. राधाकृष्णन लाइब्रेरी को विश्वविद्यालय का हृदय स्थल मानते थे, यहां के पुस्तक प्रबंधन को आधुनिक कलेवर देने के लिए डा. रंगनाथन को वह बीएचयू लाना चाहते थे। 1944 में रंगनाथन जी को दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के कुलपति सर मोरिस ग्वायर और राधाकृष्णन द्वारा विश्वविद्यालय में ग्रंथालय विज्ञान विभाग के प्रबंधन का आमंत्रण मिला। डा. रंगनाथन की प्राथमिकता डीयू थी, मगर मृदु स्वाभावी डा. राधाकृष्णन जैसे एक महान शिक्षक के विनम्र आमंत्रण ने उन्हें बीएचयू बुला ही लिया। हालांकि आजादी के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी को लंबे समय तक उन्होंने सेवाएं दी। डा. संजीव सराफ के अनुसार बीएचयू में लाइब्रेरियन रहते हुए उन्होंने महज 18 महीनों में केंद्रीय ग्रंथालय के एक लाख से अधिक ग्रंथों का वर्गीकरण कर दिया। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने ही दिए गए 'परासरण के नियमÓ की सहायता ली। वहीं इस दौरान वह अपने अध्यापन और प्रशासनिक कर्तव्यों का भी निर्वहन करते रहे।

बीएचयू में बनाई भारत की राष्ट्रीय ग्रंथ प्रणाली

डा. संजीव सराफ के अनुसार डा. रंगनाथन ने बीएचयू लाइब्रेरी साइंस का पाठ्यक्रम भी तैयार किया और द बेसेंट स्कूल काशी के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट में सदस्य एवं भारतीय ग्रंथालय संघ के अध्यक्ष भी रहे। साथ ही सूचीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय शोध के चलते डिक्शनरी कैटालॉग कोड भी वर्ष 1945 में अस्तित्व में आया। वहीं 1946 में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय ग्रंथालय प्रणाली की योजना तैयार की। उपग्रंथालयी डा. शुचिता ङ्क्षसह के अनुसार डा. रंगनाथन द्वारा प्रतिपादित स्टॉफ फार्मूला और थ्री कार्ड सिस्टम आज भी ग्रंथालय प्रबंधन के अहम टूल हैं।

पुस्तकालय को दिया प्रयोगशाला का स्वरूप

बीएचयू के पुस्तकालय एवं सूचना विभाग के प्रो. आदित्य त्रिपाठी के अनुसार डा. रंगनाथन अपने कार्य के प्रति के इतना समर्पित थे कि थे कि अपनी माता के दाह संस्कार के बाद सीधे कक्षा लेने चले आए। बीएचयू आने पर उनकी यह इच्छा थी कि महामना के सपनों के अनुरूप ही पुस्तकालय को प्रयोगशाला का रूप देकर एक-एक मॉडल लाइब्रेरी का विकास करे, जिसका अनुसरण सारी दुनिया करे। ऐसा हुआ भी कि अरसों तक बीएचयू की सेंट्रल लाइब्रेरी विश्व स्तरीय लाइब्रेरी के रूप देखी गई।

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