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Dr. Lalji Singh Birth Anniversary दुनिया में सबसे पहले डीएनए फिंगर प्रिंट का सूत्रपात हुआ था बीएचयू में

वाराणसी, जेएनएन। Dr Lalji Singh Birth Anniversary (जन्म- 5 जुलाई, 1947, निधन - 10 दिसंबर, 2017) नब्बे के दशक में भारत के न्यायालयों का विश्वास डीएनए फिंगर प्रिंट की ओर तेजी से बढ़ रहा था। मानव रक्त संबंधों को सुलझाने और पीडि़त को न्याय दिलाने में यह तकनीक कानून का बखूबी साथ देने लगी थी। हालांकि इसके लिए भारत में डीएनए फिंगर प्रिंट के जनक डा. लालजी सिंह को कई-कई घंटे न्यायालय के कटघरे में खड़े होकर गवाही देनी होती थी और वकीलों से तू-तू मैं-मैं तक हो जाती थी। प्रेमानंदा केस से लेकर राजीव गांधी हत्याकांड तक में सभी अभियुक्तों को सफलतापूर्वक दोषी साबित कर दिया गया, जिसके पीछे निसंदेह डा. लालजी सिंह ही मुख्य भूमिका में रहे।

आज दुनिया भले ही डीएनए फिंगरप्रिंट का पहला खोजकर्ता सर एलेक जेफरी को माने लेकिन डीएनए फिंगर प्रिंट का सूत्रपात दुनिया में सबसे पहले बीएचयू में हुआ, जब सत्तर के दशक में डा. लालजी सिंह यहां से एमएससी के बाद साइटोजेनेटिक्स में पीएचडी कर रहे थे। सर्प के लिंग निर्धारण पर शोध करते हुए उन्हेंं उसके डीएनए में एक तत्व बीकेएम (बैंडेड करैत माइनर) प्रोब का पता चला। उन्होंने अध्ययन में पाया कि इसी तत्व की वजह से हर सर्प की एक विशिष्ट (यूनिक) पहचान तय हो रही थी। इसपर विस्तृत शोध के लिए वह बीएचयू से जहाज में एक कंटेनर करैत सांप भर कर 1974 में स्कॉटलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग पहुंचे, जहां उनके इस अनोखे प्रयोग को देख दुनियाभर के वैज्ञानिक आश्चर्यचकित हो उठे। वह फिंगरप्रिंट के एक मुकाम तक पहुंच ही रहे थे कि 1984 में मानव जीन पर सबसे पहले शोध कर सर एलेक जेफरी ने डीएनए फिंगरप्रिंट तकनीक की खोज कर दी। इसके कुछ वर्षों बाद अपना शोध खत्म कर डा. सिंह ने भारत आकर न्यायालय के जटिल मसलों पर फिंगर प्रिंट तकनीक का प्रयोग करना शुरू किया, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट, केरल कोर्ट में पितृत्व साबित करने का मामला, तंदूर कांड और राजीव गांधी हत्याकांड केस बेहद चॢचत हुआ और तबसे वह भारत में भारत में डीएनए फिंगर प्रिंट के जनक कहलाने लगे।

21वें दशक की शुरुआत में बीएसएल -4 लैब शुरू करने की पहल

डा. सिंह की दूरदृष्टि का एक और जीवंत उदाहरण तब देखने को मिला जब उन्होंने 2000 की शुरुआत में ही वर्तमान के सबसे अत्याधुनिक बीएसएल - 4 वायरल लैब (आज कोरोना जांच के लिए सबसे आदर्श लैब) की शुरुआत करने की पहल हैदराबाद में की थी और 110 करोड़ रुपये आवंटित भी हो गए थे, जिसे अप्रासंगिक प्रोजेक्ट मानकर कुछ कारणों से 2009 में बंद कर दिया गया था।

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