डा. हेडगेवार ने बनारस में आरएसएस की नई शाखा स्थापित कर गोलवलकर को बनाया पहला सचिव

गोलवलकर में राष्ट्रीयता की अलख जगाने में भी बनारस और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का ही योगदान रहा। जब वह बीएचयू में बीएससी करने आए तब यहां के केंद्रीय ग्रंथालय में लाखों पुस्तकों का भंडार मिला। यहां आकर उनमें ज्ञान और अध्यात्म की भूख काफी बढ गई।

Saurabh ChakravartySat, 05 Jun 2021 01:13 PM (IST)
माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर में राष्ट्रीयता की अलख जगाने में भी बनारस और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का ही योगदान रहा।

वाराणसी, जेएनएन। बीएचयू के संस्थापक पं. मदन मोहन मालवीय के राष्ट्रवादी विचार और शिक्षा प्रणाली से प्रेरित होकर वर्ष 1924 में माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर (जन्म - 19 फरवरी, 1906, नागपुर, निधन - 5 जून, 1973 - नागपुर) बनारस आए और जब वह वर्ष 1933 में यहां से नागपुर गए तो 'गुरु' गोलवलकर के रूप में। गुरु की उन्हें कोई उपाधि तो नहीं मिली थी, लेकिन बीएचयू के छात्र उन्हें इसी संबोधन से पुकारते थे। गोलवलकर बीएचयू में जंतु विज्ञान के प्रोफेसर रहते हुए दर्शन, अंग्रेजी व अर्थशास्त्र की भी कक्षाएं लेते थे। इस दौरान बीएचयू के एक दूसरे छात्र व संघ के तात्कालिक सचिव भैया जी दाणी के संपर्क में वह आए। वहीं आरएसएस के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने पहली बार बीएचयू का दौरा किया, जहां पर गोलवलकर की पहली मुलाकात हेडगेवार से हुई। इसके बाद हेडगेवार ने बनारस में आरएसएस की नई शाखा स्थापित की और उनको यहां का पहला सचिव बनाया गया। दो वर्ष महामना का आशीर्वाद लेकर राष्ट्रीय व सांस्कृतिक सेवा के उद्देश्य के साथ गोलवलकर नागपुर चले आए।

बीएचयू ने जगाई राष्ट्रीयता व आध्यात्मिकता की अलख

गोलवलकर में राष्ट्रीयता की अलख जगाने में भी बनारस और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का ही योगदान रहा। जब वह बीएचयू में बीएससी करने आए तब यहां के केंद्रीय ग्रंथालय में लाखों पुस्तकों का भंडार मिला। यहां आकर उनमें ज्ञान और अध्यात्म की भूख काफी बढ गई। रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद, तुलसीदास और कबीर समेत हजारों किताबें पढ़ डालीं। इसी वजह से उन्होंने यहीं से एमएससी भी किया। पुस्तक श्री गुरुजी प्वाइनियर ऑफ ए न्यू इरा के अनुसार महामना के पदचिन्हों पर चलते हुए इसी अध्ययनकाल ने उनके भीतर आध्यात्मिकता, वैचारिक समृद्धता और राष्ट्रवाद की भावना का आविर्भाव हुआ। पढ़ाई पूरी करने के बाद महामना ने ही उन्हें बीएचयू में जूलाजी के लेक्चरर पद पर आसीन किया। यहां से वह युवाओं में अपने व्यक्तित्व, कद-काठी और सुलझे विचारों वाले शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध हुए। वह गरीब छात्रों का शुल्क और किताब-कापी का खर्च अपने वेतन से चुकाते थे। गांधीनगर केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आरएस दुबे ने बताया कि आठ अप्रैल 1938 को बीएचयू के एक कार्यक्रम में तीनों विभूतियां एक साथ एक मंच पर थी और मालवीय जी ने संघ को देश प्रेमियों का संगठन कहा था। नेशनल मेडिकोस संगठन के जनरल सेक्रेटरी डा. विश्वंभर सिंह के अनुसार भारत के सभी सांस्कृतिक संगठनों के प्रादुर्भाव में गुरु गोलवलकर का ही योगदान रहा है।

 

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