यूरोपीय और दक्षिण एशियाई लोगों का कोविड-19 के लिए भिन्न आनुवंशिक सम्बन्ध

कोविड से मौतों पर निष्कर्ष निकाला गया कि यूरोपीय लोगों के में कोविड-19 गंभीरता के लिए जिम्मेदार आनुवंशिक कारक दक्षिण एशियाई लोगों में कोई भूमिका नहीं निभा रहे हैं। यह रिसर्च साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुई है।

Abhishek SharmaFri, 11 Jun 2021 04:32 PM (IST)
बांग्लादेश की जाति और जनजातीय आबादी की कोविड-19 के साथ अलग अलग संवेदनशीलता हैं।

वाराणसी, जेएनएन। सम्पूर्ण विश्व को अपने चपेट में लेने वाले कोविड-19 महामारी में, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि कुछ लोगों की दूसरों की तुलना में अधिक गंभीर लक्षण और यहां तक कि मृत्यु भी हो जाती है। पिछले वर्ष यूरोपीय लोगों पर किए गए एक शोध में पाया गया कि आधुनिक मानव निएंडरथल से एक डीएनए सेगमेंट का अनुवांशिक स्थानातरण हुआ इस 50,000 नुक्लियोटाइड सीक्वेंस में कुछ म्युटेशन पाए गए जो किसी व्यक्ति को कोविड-19 के प्रति गंभीर बनाते है। यह डीएनए सेगमेंट यूरोप के 16% की तुलना में 50% दक्षिण एशियाई लोगों में मौजूद है।

वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने दक्षिण एशियाई आबादी के बीच कोविड-19 संवेदनशीलता को निर्धारित करने में इस डीएनए सेगमेंट की भूमिका का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन का निर्देशन सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स एंड चीफ साइंटिस्ट, सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी), हैदराबाद के निदेशक डॉ कुमारसामी थंगराज और काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने किया था। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यूरोपीय लोगों के में कोविड-19 गंभीरता के लिए जिम्मेदार आनुवंशिक कारक दक्षिण एशियाई लोगों में कोई भूमिका नहीं निभा रहे हैं। यह रिसर्च साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुई है।

“इस अध्ययन में, हमने महामारी के दौरान तीन अलग-अलग समय पर दक्षिण एशियाई जीनोमिक डेटा के साथ संक्रमण और मामले और मृत्यु दर की तुलना की है। हमने विशेष रूप से भारत और बांग्लादेश के सैंपल का एनालिसिस किया”, डॉ थंगराज ने कहा।

"हमारा परिणाम दक्षिण एशियाई आबादी की अनूठी अनुवांशिक विभिन्नता को दोहराता है। दक्षिण एशियाई कोविड-19 रोगियों पर एक जीनोम-वाइड एसोसिएशन अध्ययन एशियाई उप-महाद्वीप में हमारे लिए जरुरी है”, इस अध्ययन के पहले लेखक प्रज्ज्वल प्रताप सिंह ने कहा।

अध्ययन से यह भी पता चलता है कि बांग्लादेश की जाति और जनजातीय आबादी की कोविड-19 के साथ अलग अलग संवेदनशीलता हैं।

प्रसिद्ध लिंग्विस्ट और अध्ययन के सह-लेखक प्रोफेसर जॉर्ज वैन ड्रिम ने कहा, "जनसंख्या महामारी के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिकों को बांग्लादेशी आबादी में जाति और आदिवासी आबादी को अलग करके अपने निष्कर्षों की व्याख्या करने के लिए और अधिक सतर्क रहना चाहिए।"

होस्ट जीनोमिक्स के अलावा हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कौन से वेरिएंट पहले से टीका लगाए गए लोगों की प्रतिरक्षा से बचने की संभावना रखते हैं", प्रोफेसर अनिल के त्रिपाठी, निदेशक विज्ञान संस्थान बीएचयू ने कहा।

इस अध्ययन में: बीएचयू, वाराणसी से अंशिका श्रीवास्तव और नरगिस खानम; डॉ अभिषेक पाठक और प्रोफेसर रोयाना सिंह, आयुर्विज्ञान संस्थान, बीएचयू; ढाका विश्वविद्यालय, बांग्लादेश से डॉ गाज़ी सुल्ताना; डॉ पंकज श्रीवास्तव, फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला, सागर, एमपी; और डॉ प्रशांत सुरवंझाला, बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च, जयपुर भी शामिल थे।

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