वाराणसी के ज्ञानवापी मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका पर फैसला सुरक्षित, सुनवाई की अगली तिथि आठ मार्च

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से दाखिल प्रार्थना पत्र पर शनिवार को पक्षकारों की बहस पूरी हो गई।

ज्ञानवापी मामले में पक्षकार बनाये जाने के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से दाखिल प्रार्थना पत्र पर शनिवार को पक्षकारों की बहस पूरी हो गई। सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) आशुतोष तिवारी की अदालत ने फैसला सुरक्षित रखते हुए आठ मार्च की तिथि तय की है ।

Saurabh ChakravartySat, 06 Mar 2021 07:37 PM (IST)

वाराणसी, जेएनएन। ज्ञानवापी मामले में पक्षकार बनाये जाने के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से दाखिल प्रार्थना पत्र पर शनिवार को पक्षकारों की बहस पूरी हो गई। सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) आशुतोष तिवारी की अदालत ने फैसला सुरक्षित रखते हुए आठ मार्च की तिथि तय की है ।

सुनवाई के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जीत नारायण सिंह व चंद्रशेखर सेठ ने दलील दी कि ज्ञानवापी परिक्षेत्र का कथित विवादित स्थल मंदिर का ही भाग है। इस दावे को प्रमाणित करने के लिए कई साक्ष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पास उपलब्ध है जिसे वह अदालत में दाखिल करना चाहते हैं। यह भी कहा गया कि अदालत प्रतिनिधित्व वाद में किसी भी अतिरिक्त व्यक्ति को वादमित्र नियुक्त कर सकती है।

वादी (देवता) पक्ष का बेहतर प्रतिनिधित्व और वाद के निस्तारण में सहयोग करने की भावना से वादमित्र के तौर पर पक्षकार बनने के लिए उनकी ओर से प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया है। रामजन्म भूमि मुकदमे में भी अदालत द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को गवाह के तौर पर पक्षकार मानते हुए पक्ष रखने के लिए बुलाया गया था। उन्होंने बहुत से महत्वपूर्ण साक्ष्य भी प्रस्तुत किये थे।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की याचिका पर वादी प्राचीन मूर्ति स्वयंभू देवता ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेवरनाथ की ओर से पैरवी कर रहे वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी,सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड व अंजूमन इंतजामिया मसाजिद के अधिवक्ता तौहिद खान व रईस अहमद की ओर से आपत्ति की गई। विजय शंकर रस्तोगी की ओर से दलील दी गई कि उक्त प्रतिनिधित्व वाद में देवता का प्रतिनिधित्व एक ही व्यक्ति कर सकता है। जन प्रतिनिधित्व वाद में वाद पंजीकृत होने तथा किसी को भी पक्षकार बनने के लिए अदालत द्वारा प्रकाशन के जरिए नियत तिथि के पश्चात कोई पक्षकार नहीं बन सकता है।

वर्ष 1991 में 15 अक्टूबर को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में उक्त वाद दाखिल होने के पश्चात समाचार पत्रों में नोटिस प्रकाशन कराकर आम लोगों को पक्षकार बनने के लिए आह्वान किया गया था। परंतु नियत तिथि तक कोई अन्य पक्ष उपस्थित नहीं हुआ था। सिर्फ कार्यवाही को अनावश्यक रुप से विलंबित करने के लिए यह प्रार्थना पत्र दिया गया है।स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने प्रार्थना पत्र में यह जिक्र नहीं किया है कि उन्हें किसका वादमित्र बनाया जाए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मुकदमे से संबंधित अपना साक्ष्य और महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्य देकर उनकी मदद कर सकते हैं। इसके लिए उनको वादमित्र अथवा पक्षकार बनना आवश्यक नहीं है।

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से अधिवक्ता तौहिद खान व अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के अधिवक्ता रईस अहमद की ओर से दलील दी गई कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का प्रार्थना पत्र प्रतिनिधित्व वाद की परिधि में नहीं आता है और प्रार्थना पत्र में उनकी ओर से की गई अपील विधिविरुद्ध है। उक्त मुकदमे में वे आवश्यक व जरुरी पक्ष नहीं हैं। इनको पक्षकार बनाये बिना भी मुकदमे का निस्तारण संभव है। यदि इन्हें पक्षकार बनाया जाता है तो न्यायालय में लंबित मुकदमों की सुनवाई प्रभावित होगी। सभी पक्षकारों ने अपने-अपने दलील के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की नजीरों को भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया। उधर काशी विश्वेश्वरनाथ मंदिर व ज्ञानवापी मस्जिद विवाद की पोषणीयता को लेकर लंबित याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई जारी है।अगली सुनवाई के लिए दस मार्च की तिथि मुकर्रर है।

बता दें कि ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण तथा हिंदुओ को पूजा पाठ करने का अधिकार आदि को लेकर वर्ष 1991 में प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ की ओर से पक्षकार पं.सोमनाथ व्यास,हरिहर पाण्डेय  आदि ने मुकदमा दायर किया था।

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