मेले की याद : ददरी मेले की चर्चा में डूबे गांव, बुजर्ग साझा कर रहे अपनी यादें, मेले में दिखती थी हस्तशिल्प की दुकानें

बलिया [गोपाल पांडेय]। बलिया का प्रसिद्ध ददरी मेला अब अपने शबाब पर है। यह ऐसा मेला है कि जनपद के हर गांव के लोग एक दिन ही सही मेले में जरूर पहुंचते हैं। अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हैं। गुड़ की जलेबी, मेले में गीत गवनई, चरखी झूला, चेतक प्रतियोगिता आदि को देख कर हर किसी का मन दो दशक पूर्व के पुरानों यादां की ओर दौड़ा चला जाता है। 

भृगु मुनि की पावन तपोस्थली पर उनके शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर प्रति वर्ष लगने वाले ददरी मेला से हर किसी की कुछ न कुछ यादें जुड़ी हैं। उसी में से एक याद है मेले तक बैलगाड़ी की सवारी। ददरी मेला शुरू होते ही गांवों में बहुत से लोग अपनी पुरानी यादों को एक-दूसरे से साझा करने लगे हैं। क्षेत्र के लोगों से दददरी मेले के संबंध में बात करने पर वे बताते हैं कि काफी अच्छी होती थी तब की यारी, ददरी मेले तक बैलगाड़ी की सवारी, अब जमाना बदल गया, संसाधन भी बढ़ गए, लेकिन मेले को लेकर जितना मन तब उत्साहित रहता था, अब नहीं रहता। मेले से जुड़ी अपनी यादों को कुछ इस अंदाज में साझा किए लोग। 

 

-तब और अब में काफी अंतर आ चुका है। तब के समय में गांव के के युवक दो पहले पहले से जेब खर्च के लिए मिलने वाले रुपयों को इस मेला के लिए ही जमा करते थे। ददरी मेला लगने के बाद बेलगाड़ी पर सभी बैठकर हंसी-मजाक करते टोली में ही मेला पहुंचते थे। अब साधन बढ़ गए लेकिन उसी के साथ गांव का मन-मिजाज भी बदल गया है। अब हर कोई कुछ अलग अंदाज में ददरी मेला जाते हुए दिखता है। वे बताते हैं कि उस समय मेले से वापसी होने के बाद भी कई दिनों तक मेले की चर्चा गांवों में होते रहती थी। अब पहले से भी ज्यदा लोग मेला जाते दिखते हैं लेकिन चर्चा खुद तक ही सीमित है। -भरत पाण्डेय, अध्यात्मवेत्ता आचार्य

 

-उस समय उस समय लोगों के बीच आपसी प्रेम, सौहार्द व भाईचारा था, अब वैसा नहीं दिखता। महिलाएं पैदल ही करबो जरुर हो भृगु मुनि के दर्शन आदि लोकगीतों को गाती हुई बलिया पहुंचती थी और पहले गंगा स्नान के बाद मेला में पहुंचती थी। शहर से दूर हनुमानगंज, फेफना, शंकरपुर आदि बाजार भी इस मेले को लेकर गुलजार रहते थे। -श्रीकान्त पाण्डेय, राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित बुजुर्ग शिक्षक

-उस समय मेले में जनपद के प्रत्येक क्षेत्र की मशहूर हस्तशिल्प सहित अन्य दुकानें भी लगती थीं, जिसे लोग काफी पसंद करते थे। उस समय सहतवार कस्बे से पालकी, बैरिया से चमौधे तक जूतों की दुकान, तुर्तीपार से पीतल के वर्तन, हनुमानगंज का सिंहोरा, मनियर की ङ्क्षबदी, रतसर की पापड़ी, रसड़ा से मिट्टी के वर्तन एवं खिलौने की दुकानें, करम्मर से हथकरघे द्वारा तैयार कपड़े आदि की दुकान लगती थीं। इन दुकानों की साज-सज्जा जनपद के औद्योगिक विकास का बोध कराती थी। - धनेश कुमार पाण्डेय, संरक्षक, साहित्यिक संस्था निर्झर 

 

-मनोरंजन के जो साधन उस समय प्रयुक्त होते थे वे सभी इस मेले में मिलते थे। इसके अतिरिक्त नौटंकी, ड्रामा, दंगल, सर्कस, गायन, वादन की टीमें भी मेले को शबाब पर पहुंचाती थीं। वर्ष 2000 में संतों के प्रयास से धार्मिक सत्संग, प्रवचन और गंगा आरती शुरु हुई। समय के साथ-साथ गंगा सरयू का संगम स्थल परिवर्तित होता रहा और मेला भी शहर की तरफ बढ़ता गया, साथ ही इसका भौतिक स्वरुप भी बदल गया। अब भौतिक चकाचौंध में मेला पूरी तरह रंगा रहता है तथा मेले में उपलब्ध सामग्री व खरीद बिक्री भी वक्त के मुताबिक होने लगी है।

-पं.कृपाशंकर तिवारी

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