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घर का काम करके खाली समय में चलाती हैं चरखा, समृद्धि की ओर आदिवासी महिलाएं

सोनभद्र [सुजीत शुक्ल]। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वराज का विचार जनपद से दूर आदिवासी अंचल के गांवों में खूब फल-फूल रहा है। खास बात यह है कि पुरुषों के साथ महिलाएं सशक्त हो रही हैं। गांव आत्मनिर्भर होने की ओर अग्रसर हैं जो गांधी जी का सपना था। गांधीजी ने यंत्र की जगह श्रम को महत्ता दी और उन कामों को हाथों से कराने पर बल दिया, जिसमें मशीन की जरूरत नाममात्र की न हो। इस दिशा में यहां की महिलाएं संख्या में भले कम हैं लेकिन, चरखे के जरिए आत्मनिर्भर होना क्या होता है ने मिसाल कायम की है।

गोविंदपुर की रहने वाली बुधनी और कल्पना दो ऐसे नाम हैं जो कठिन समय में इसी हाथ से चलने वाले चरखे की बदौलत अपने परिवार की व्यवस्था को आगे बढ़ाया। दोनों के पति नहीं थे। बावजूद इसके इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने परिवार को आगे बढ़ाया। बुधनी ने बपने पुत्रों को पढ़ालिखाकर आत्मनिर्भर बनाया तो कल्पना ने भी बेटे को बीकाम की पढ़ाई पूरी करायी। ये दो महज उदाहरण हैं सूबे के सर्वाधिक आदिवासी जनसंख्या वाले जनपद सोनभद्र में म्योरपुर ब्लाक के गोविंदपुर स्थित बनवासी सेवा आश्रम से जुड़कर इनकी तरह सैकड़ों महिलाएं आज अपनी व अपने परिवार के समृद्धि की गौरव गाथा लिख रही हैं। गोविंदपुर के साथ ही बभनी, दुद्धी और बीजपुर में ये केंद्र चलते हैं। चहां खाली समय में महिलाएं आती हैं और चरखा चलाकर सूत कातती हैं। प्रतिदिन अपने घर का काम करने के बाद भी सवा सौ से डेढ़ सौ रुपये की कमाई कर लेती हैं।

कैसे मिलती है मजदूरी

बनवासी सेवा आश्रम में इस कारोबार की जिम्मेदारी संभालने वाले लालबहादुर बताते हैं कि क्षेत्र की महिलाओं के लिए यह बढिय़ा है। कोई भी गरीब परिवार की महिला अपने घर पर रहकर, संपूर्ण काम करते हुए प्रतिदिन सौ से 200 रुपये तक कमा सकती है। बताया कि सूत की कताई में लगी एक महिला अगर पांच घंटे चरखा चलाती है तो करीब 500 ग्राम से ज्यादा सूत निकालेगी। एक किलो सूत निकालने पर 200 रुपये मिलते हैं। इस तरह से उसे 100 रुपये मिले। इसके साथ ही 12 फीसद कल्याण कोष और दस फीसद अनुग्रह राशि दी जाती है। वर्तमान समय में 84 महिलाएं सूत कातने में लगी हैं।

तैयार होता है सूती खादी का गमछा

क्षेत्र की महिलाओं के हाथों से निकाले गए सूत की बुनाई होती है। इसके लिए अलग टीम होती है। इससे सूती खादी से बना पैंट, शर्ट का कपड़ा, लूंगी, गमछा, कुछ थान के कपड़े बनाए जाते हैं। इनकी बिक्री आस-पास के बाजारों में व कुछ छत्तीसगढ़, झारखंड के बाजारों में होती है।

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