बंदिशों में चिर नूतन बंदिशों की सर्जना कर रहीं हैं बीएचयू की प्रो. संगीता पंडित

गहन रात बीती मिटा घना अंधेरा नवल ज्योति फूटी सबेरा हुआ है। बीते कठिन व दीर्घकालिक त्रासद दौर के सन्नाटे को तोड़ते विपरीत धारा को नई मंजिलों की ओर मोड़ते इस प्रभाती गीत का धुला-धुला सा उजाला सद्य स्नाता के सौंदर्य सा मन की गहराई तक उतर जाता है।

Saurabh ChakravartyFri, 22 Oct 2021 09:05 AM (IST)
बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय में विधार्थीयों को गायन सिखाती डा. संगीता पंडित।

वाराणसी, कुमार अजय। गहन रात बीती, मिटा घना अंधेरा नवल ज्योति फूटी सबेरा हुआ है। बीते कठिन व दीर्घकालिक त्रासद दौर के सन्नाटे को तोड़ते, विपरीत धारा को पूर उम्मीदी की नई मंजिलों की ओर मोड़ते इस प्रभाती गीत का धुला-धुला सा उजाला सद्य: स्नाता के सौंदर्य सा मन की गहराई तक उतर जाता है। जब जागरण प्रतिनिधि एक लंबे अरसे से मनहूस खामोशी से ऊबर कर फिर एक बार सुर-ताल की अठखेलियों से रजगज बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय की अंगनाई में खुद को खड़ा पाता है। वाग्देवी मां शारदा की शिल्प छवि को नमन कर संकाय की गोलाकार वृतिका के दूसरे ही कक्ष में हमारी भेंट होती है गायन कला विभाग के प्रमुख प्रो. संगीता पंडित से जो सहयोगियों और छात्राओं के बीच बैठी अपनी अद्यतन रची गई राग-मालकौंस की बंदिश श्याम सुंदर वन माली, विहरत कुंज गलिन में संग राधा नवेली... के आलाप को नया आकाश दे रही हैं। स्वत: स्फूर्त नई ऊर्जा से नव उजास का उपहार ले रही हैं।

प्रो. पंडित कहती हैं कि निश्चित तौर पर बीता समय बहुत भारी गुजरा ङ्क्षकतु उस कठिन काल में भी हमने अपने सहयोगी आचार्यों व विद्यार्थियों से आभासी माध्यम से संपर्क बनाए रखा। सुर साधना को विराम दिए बगैर आशाओं की कोमल कोपलों को अपनी कोशिशों से जिलाए रखा। प्रो. पंडित के सहयोगी डा. रामशंकर बताते हैं कि किस तरह कोविड की बंदिशों के बीच भी हमारी साधना अखंड रही। रियाज के साथ हम नित नूतन बंदिशों की मालिका सजाते रहे, नई सर्जनाओं की अविरल धारा बहाते रहे। नैराश्य का सन्नाटा तोडऩे की गरज से हमने कोरोना की पहली लहर में भी 28-29 मई को अंतरराष्ट्रीय वेबिनार संगीत-शिक्षण व मंच प्रस्तुति के आयोजन से देशभर के संगीत साधकों व कलानुरागियों को एक दूसरे से जोड़ा। गहन विमर्श के गुरु गंभीर शब्दों के घोष से पर्वतों से भी वजनी मौन का साम्राज्य तोड़ा। इसी कड़ी में संकाय की ओर से रियाज के अलग-अलग पक्षों व परंपराओं पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से एक सात दिनी कार्यशाला का भी आभासी आयोजन किया। इसके अलग-अलग सत्रों को पद्मश्री शुभा मुद्गल, सुधाकर देवले (उज्जैन), हेमंत पेडसे (पुणे), राजेश केलकर (बड़ौदा), प्रो. स्नेहाशीष दास (बदौड़ा), अशोक हुग्गनवार (कर्नाटक), अभिराज तायड़े (नासिक), अल्का देव मारुलकर (नासिक) के साथ ही अपनी विभाग प्रमुख प्रो. संगीता पंडित का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। कहती हैं प्रो. पंडित क्रूर आपद काल के पश्चात हुए नवविहान में पुन: एक नई चेतना जगी है। आचार्यों से लेकर स्नातकों तक के मुखमंडल पर एक लंबे कालखंड के बाद उमंग और उल्लास की चमक खिली है। हर कोई चेतना के नए रागों व नित नूतन बंदिशों की रचना और रचे हुए को साधने में तल्लीन है। अभी बीते दो चार दिनों में ही राग पटदीप में मेरी नई बंदिश गुरु चरनन में धरो नित ध्यान... के साथ हमारी वरिष्ठ मार्गदर्शक प्रो. शारदा वेलंकर ने राग सरस्वती में आए प्रीतम द्वारे...। तो इसी क्रम में डा. मधुमिता भट्टाचार्य ने राग अड़ाना में पिया न माने मेरी आज कैसे समझाऊं दिल की बात... जैसी श्रृंगारिक बंदिश को शब्द और स्वर दिए हैं। प्रो. के शशि कुमार ने नवरात्र में नई बंदिशों राग विभास में शिव-शिव महेशरा... व राग सरस्वती में मां सरस्वती वीणा वादिनी... के संयोजन से शिव व शक्ति स्वरूपा देवी महामाया को नवरात्र की स्वरांजलि अर्पित की है। डा. रामशंकर ने भी राग बिलावल में हरि के भजन नित करिए सजनवा, रहिए घर में ही आठों याम... की रचना कर भक्ति धारा बहाई है। आगे हमारा पूरा ध्यान नवीन रागों के सृजन पर रहेगा।

सृजन का क्रम कभी थमता नहीं

अपने संक्षिप्त संदेश में कहती हैं प्रो. संगीता-समय काल के अनुसार बिम्बों के आयाम भले ही बदल जाएं सृजन का क्रम कभी थमता नहीं, फिर चाहे वह सृष्टि का सृजन हो या प्रलय काल। यह बात और है कि सृष्टि की संरचना काल में नदी की जो धारा कल-कल के स्वर से मन को हुलसाती है। वहीं प्रलयकाल में शायद प्रणयंकर बनकर घोर गर्जना के साथ समूची सृष्टि को ही लील जाती है।

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