वाराणसी में तैयार होती है वीरांगनाओं की ‘फौज’, शास्त्र के साथ शस्त्र की भी मिलती है शिक्षा

यहां पर वेद वेदांग उपनिषद कर्मकांड की शिक्षा देकर छात्राओं को वेद विदुषी तो बनाया ही जाता है उन्हें तलवार तीर-धनुष लाठी-भाला चलाने समेत आत्मरक्षा के अन्य हुनर भी सिखाए जाते हैं ताकि किसी भी परिस्थितियों का वह मुकाबला कर सकें।

Abhishek SharmaTue, 12 Oct 2021 05:27 PM (IST)
वैदिक ज्ञान का उनके पास इतना बड़ा भंडार कि शाश्त्रार्थ में बड़े से बड़े विद्वानों को भी मात दे दें।

वाराणसी, जागरण संवाददाता। अबला समझकर कभी कोई उन्हें छेड़ने की जुर्रत न करे क्योंकि वह ऐसों को पलक झपकते ही धूल चटा सकतीं हैं। वैदिक ज्ञान का तो उनके पास इतना बड़ा भंडार कि शाश्त्रार्थ में बड़े से बड़े विद्वानों को भी मात दे दें। ऐसी वीरांगनाओं की फौज तैयार होती है पाणिनि कन्या महाविद्यालय में। यहां पर वेद, वेदांग, उपनिषद, कर्मकांड की शिक्षा देकर छात्राओं को वेद विदुषी तो बनाया ही जाता है, उन्हें तलवार, तीर-धनुष, लाठी-भाला चलाने समेत आत्मरक्षा के अन्य हुनर भी सिखाए जाते हैं , ताकि किसी भी परिस्थितियों का वह मुकाबला कर सकें।

गुरुकुल पद्धति से संचालित पाणिनि कन्या महाविद्यालय की स्थापना वर्ष 1971 में हुई थी। यहां नौ से 11 वर्ष की छात्राओं का ही प्रवेश लिया जाता है। उन्हें प्रथमा, मध्यमा, शास्त्री से लेकर आचार्य तक की शिक्षा प्रदान की जाती है। खास बात यह है कि पूरे 13 वर्ष के अध्ययन काल के दौरान उन्हें विद्यालय के आवासीय परिसर में रहना अनिवार्य होता है। साल में कुछ खास अवसरों पर ही उन्हें परिवारीजनों से मुलाकात का मौका दिया जाता है। महाविद्यालय में देश के विभिन्न राज्यों की करीब 125 छात्राएं विविध पाठ्यक्रमों में अध्ययनरत हैं।

भोर में चार बजे से शुरू होती है दिनचर्या : पाणिनि कन्या महाविद्यालय में रहकर अध्ययन करने वाली छात्राओं की दिनचर्या भोर में चार बजे से शुरू हो जाती है। भोर में 4.30 बजे सामूहिक मंत्रपाठ, सुबह 6 से 6.30 योगासन, 6.30 बजे हवन-पूजन, नौ से दोपहर 12 बजे और दो से शाम पांच बजे तक कक्षाएं चलती हैं। इसके बाद शाम को 5 से 6 बजे तक खेलकूद व शाकवाटिका को संवारना, शाम 6.30 से 7.30 बजे तक हवन-पूजन, 7.30 बजे से रत 9 बजे तक भोजन व मनोरंजन आदि और फिर मंत्रों के पाठ के बाद रात 10 बजे शयन करना होता है।

वेद पाठ के साथ ही कम्प्यूटर का भी ज्ञान : यहां रहने वाली छात्राओं को वेदों के सस्वर पाठ, शास्त्रीय गायन के साथ ही लाठी, तलवार, भाला, जूडो, धनुष विद्या का नियमित अभ्यास तो कराया ही जाता है, उन्हें कम्प्यूटर का भी ज्ञान दिया जाता है ताकि बदलते परिवेश में वह ज्ञान के मामले में किसी से पीछे न रह जाएं।

मिथकों को तोड़़ पुरुषों को दे रहीं चुनौती : सनातनी समाज में महिलाओं को वेद पढ़ना कभी वर्जित माना जाता रहा है, इस मिथकों को तोड़ कर यहां की छात्राएं न केवल वेदों का सस्वर पाठ करती हैं बल्कि कर्मकांड भी सीख रही हैं। चूंकि बिना जनेऊ धारण किए वेदपाठ नहीं किया जा सकता। इसलिए इन लड़कियों का पहले उपनयन संस्कार कराया जाता है। खास बात यह कि इनमें तमाम लड़कियां गैर ब्राह्मण परिवारों की भी हैं।

आत्मनिर्भरता के साथ ही देश सेवा का भी सपना : आचार्य की शिक्षा ग्रहण कर रही दामिनी राय बताती हैं कि वह पढ़ाई पूरी कर “वेद व्याख्याता बनना चाहती है। मोना धिमिरे का सपना किसी महाविद्यालय में प्रोफ़ेसर बनने का है। मध्यमा की पढ़ाई कर रही जया आर्या का कहना है कि वह अध्ययन पूरा करने के बाद कर्मकांड के क्षेत्र में काम करेंगी ताकि वह आत्मनिर्भर बन सकें । घर-परिवार से दूर रहकर कठिन साधना कर रहीं इन सभी छात्राओं का सपना आत्मनिर्भर बनने की साथ ही देश सेवा का भी है।

प्राचार्य ने कहा : महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. नंदिता शास्त्री बताती हैं कि हमारा पूरा प्रयास छात्राओं को वेद विदुषी व आत्मनिर्भर बनाना है। इसके लिए छात्राओं को चारों वेद सस्वर कंठस्थ कराया जाता है ताकि वह वेद प्रचरक बन सकें । इसके साथ ही उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। वह बताती हैं कि अब तक ढाई हजार से अधिक लड़कियां यहां से वेद व कर्मकांड की शिक्षा लेकर निकल चुकी हैं। सिर्फ प्रदेश में ही नहीं देश-विदेश से भी यज्ञ, कर्मकांड कराने के लिए इन छात्राओं को आमंत्रित किया जाता है। कर्मकांड सीख चुकी छात्राएं विवाह, अन्नप्राशन, नामकरण, यज्ञोपवीत , मुंडन, शांति यज्ञ, गृहप्रवेश जैसे अन्य संस्कारो को आचार्य के तौर पर कराकर आत्मनिर्भर बन रही हैं । वह बताती हैं कि यहां से निकली कई छात्राएं देश के विभिन्न महाविद्यालयों में प्रोफ़ेसर हैं, जबकि कई अन्य सरकारी नौकरियों में भी कार्यरत हैं।

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