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अक्षय तृतीया 2021 : 14 की भोर 3.26 बजे तृतीया लगेगी, 15 की सुबह 5.08 बजे तक रहेगी

वैशाख शुक्ल तृतीया 14 की भोर 3.26 बजे लग रही है जो 15 की भोर 5.08 बजे तक रहेगी।

अक्षय तृतीया पर किसी भी शुभ कार्य को किया जा सकता है। इस दिन अपुच्छ मुहूर्त माना जाता है। इस तिथि में ही त्रेता युग आरंभ हुआ। वहीं उत्तराखंड के अधिष्ठाता बद्रीनाथ का ग्रीष्मकालीन पट इस दिन खुलता है।

Saurabh ChakravartyThu, 13 May 2021 08:50 AM (IST)

वाराणसी, जेएनएन। शास्त्रों में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया का मान अक्षय तृतीया के रूप में है। तिथि विशेष पर स्नान-दान, व्रत व जप-ध्यान का विशेष महत्व है। शास्त्रीय मान्यता है कि इस तिथि में किए गए पूजन-अनुष्ठान, दान-पुण्य का फल अक्षय हो जाता है। वैशाख शुक्ल तृतीया इस बार 14 की भोर 3.26 बजे लग रही है जो 15 की भोर 5.08 बजे तक रहेगी। इस लिहाज से अबकी व्रत पर्व 14 मई को मनाया जाएगा।

शास्त्रों में अक्षय तृतीया को सनातनियों का प्रधान पर्व बताया गया है। बीएचयू के ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. विनय पांडेय के अनुसार तिथि विशेष पर स्नान-दान, जप-तप, पूजन-अनुष्ठान आदि समस्त कर्मों का फल अक्षय हो जाता है। इस कारण ही इस व्रत पर्व को शास्त्रों में अक्षय कहा गया। किसी भी क्षेत्र में सफलता कामना से व्रत, दान में जल पूरित कलश, छाता, हाथ वाला पंखा व्यंजनादि जरूरतमंद या पुरोहित को दान में देना चाहिए। हालांकि लोक मान्यता व परंपरा अनुसार तिथि विशेष पर स्वर्णादि समेत स्थिर लक्ष्मी क्रय का प्रचलन बढ़ा है। कारण यह कि इस दिन कोई शुभ कार्य, दान के साथ स्वर्णादि खरीदने पर वह भी अक्षय हो जाता है। वैशाख शुक्ल तृतीया को ही भगवान परशुराम व हयग्रीव की जयंती भी मनाई जाती है।

अपुच्छ मुहूर्त

ख्यात ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि दि्ववेदी के अनुसार अक्षय तृतीया पर किसी भी शुभ कार्य को किया जा सकता है। इस दिन अपुच्छ मुहूर्त माना जाता है। इस तिथि में ही त्रेता युग आरंभ हुआ। वहीं उत्तराखंड के अधिष्ठाता बद्रीनाथ का ग्रीष्मकालीन पट इस दिन खुलता है। काशी में गंगा स्नान के साथ त्रिलोचन महादेव की यात्रा, पूजन-वंदन का महत्व है। हालांकि इस बार कोरोना संकट के कारण घर-आंगन में ही स्नान करना श्रेयष्कर है

पूजन विधान

अक्षय तृतीया पर व्रतियों को प्रात: स्नानादि कर श्रीहरि के पितृर्थ संकल्प लेना चाहिए। भगवान को पंचामृत से स्नान, सुगंधित फूल-माला अर्पण, नैवेद्य में नर नारायण के निमित्त सेंके हुए जौ व गेहूं का सत्तू, परशुराम के निमित्त कोमल ककड़ी व हयग्रीव के निमित्त भीगी चने की दाल अर्पित कर उपवास-व्रत आरंभ करना चाहिए। भगवान श्रीहरि को केसर युक्त श्वेत चंदन का लेप अर्पित करना चाहिए।

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