52 साल बाद काशी में शुरू होगी अग्निहोत्र यज्ञ की परंपरा, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में हो रही तैयारी

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ने करीब 52 साल बाद अग्निहोत्र यज्ञ की परंपरा फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है।

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ने करीब 52 साल बाद अग्निहोत्र यज्ञ की परंपरा फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय ने इसकी रूपरेखा भी तैयार कर ली है। प्रतिदिन सुबह-शाम अग्निहोत्र यज्ञ करने के लिए प्रतिमाह 50 हजार रुपये खर्च होने का अनुमान है।

Saurabh ChakravartyThu, 15 Apr 2021 07:10 AM (IST)

वाराणसी, जेएनएन। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ने करीब 52 साल बाद अग्निहोत्र यज्ञ की परंपरा फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय ने इसकी रूपरेखा भी तैयार कर ली है। प्रतिदिन सुबह-शाम अग्निहोत्र यज्ञ करने के लिए प्रतिमाह 50 हजार रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसके लिए महाराष्ट्र, दक्षिण भारत सहित कई संस्थाओं से बातचीत की जा रही है। महाराष्ट्र की दो संस्थाओं ने इसके लिए मौखिक स्वीकृति प्रदान कर दी है। ऐसे में इन संस्थानों से जल्द समझौता होने की उम्मीद है।

वैदिक ब्राह्मण का दांपत्य जीवन जरूरी

कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने बताया कि विश्वविद्यालय में बहुत पहले अग्निहोत्र यज्ञ शुरू किया गया था। वर्ष 1969 तक करीब चार वर्षों तक यह परंपरा चली। इसके बाद यज्ञ की परंपरा ने दम तोड़ दिया। ऐसे में एक बार फिर यज्ञ की परंपरा शुरू करने का निर्णय लिया गया है। दरअसल काशी में अग्निहोत्र यज्ञ कराने वाला कोई नहीं है। इसे देखते हुए वैदिक ब्राह्मणों की तलाश की जा रही है। अग्निहोत्र यज्ञ कराने के लिए दांपत्य जीवन जरूरी है। साथ ही वैदिक ब्राह्मण को पुत्र भी होना जरूरी है। अग्निहोत्र यज्ञ कराने के लिए परिसर में रहने की मुफ्त सुविधा दी जाएगी। गाय के घी, गोबर, लकड़ी ही अग्निहोत्र यज्ञ करने की परंपरा है। ऐसे में गाय व गाय की सेवा करने के लिए एक सेवक भी नियुक्त किया जाएगा।

अग्निहोत्र एक वैदिक यज्ञ

अग्निहोत्र एक वैदिक यज्ञ है जिसका वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। अग्निहोत्र एक नित्य वैदिक यज्ञ है। इस यज्ञ को प्रतिदिन सुबह व शाम करने का विधान है। इस यज्ञ से सुख-शांति की अनुभूति, स्वास्थ्य, वायु मंडल की शुद्धि सहित अनेक लाभ हैं। खास बात यह कि अग्निहोत्र यज्ञ करने वाले के घर सदैव अग्नि प्रज्ज्वलित होती रहती है। वह इसी अग्नि से तैयार खाना भी खाते हैं, यानी अग्निहोत्र यज्ञ करने वाले घर के बाहर का खाना नहीं खाते हैं। किन्हीं कारणवश यदि बाहर जाना हुआ तो वह 'अग्नि मंथन से अग्नि प्रज्ज्वलित करते हैं। 'अग्नि मंथन अग्निहोत्र यज्ञ की दीक्षा लेने वाले लोगों को 'अग्नि मंथन नामक एक विशेष प्रकार का यंत्र दिया जाता है। मथनी की तरह लकड़ी के बने यंत्र को मथने से अग्नि प्रज्ज्वलित होती है।

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