एक बनारसी साड़ी से 40 लोगों को मिलता है रोजगार, बुनाई एक समान न दिखना ही हैंडलूम की पहचान

हथकरघा पर बनी एक बनारसी साड़ी से 40 लोगों को रोजगार मिलता है। इसमें कपास का उत्पादन करने वाले किसान के साथ ही धागा बनाना डिजाइनर बुनकर करीगर थोक और व्यापारी आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। बुनकर जुनैद ने हैंडलूम और पावरलूम में अंतर पहचानने की तरकीबें भी सुझाई।

Saurabh ChakravartyTue, 27 Jul 2021 06:40 AM (IST)
हथकरघा पर बनी एक बनारसी साड़ी से 40 लोगों को रोजगार मिलता है

वाराणसी, जागरण संवाददाता। हथकरघा पर बनी एक बनारसी साड़ी से 40 लोगों को रोजगार मिलता है। इसमें कपास का उत्पादन करने वाले किसान के साथ ही धागा बनाना, डिजाइनर, बुनकर, करीगर, थोक और व्यापारी आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। ये बातें हैंडलूम दिवस (सात अगस्त) पर आधारित एक कार्यक्रम के शुभारंभ पर बीएचयू स्थित भारत कला भवन संग्रहालय में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त उस्ताद बुनकर हाजी शाहिद जुनैद ने कही। वह भारत कला भवन की उपनिदेशक डा. जसमिंदर कौर से संवाद कर रहे थे वहीं इसका प्रसारण आनलाइन और आफलाइन दोनों मोड में हो रहा था।

बताई हैंडलूम और पावरलूम को पहचानने की तरकीब

बुनकर जुनैद ने हैंडलूम और पावरलूम में अंतर पहचानने की तरकीबें भी सुझाई। कहा कि हैंडलूम पर तैयार साड़ी को ऊजाले में लाकर देखा जाता है तो उसकी बुनाई एकसमान नहीं दिखेगी, इसी से उसका लुक बेहद खास और आंखों को सुखद अहसास कराता है। जबकि पावरलूम की साड़ियों की बुनाई एक समान दिखेगी, जिससे उनमें कोई विशिष्टता नहीं झलकती है। यह ठीक उसी प्रकार से है जैसे मशीन के बजाय हाथ से बनी रोटी ज्यादा स्वादिष्ट महसूस होती है।

गठुआ तकनीक हो गई खत्म

बनारसी साड़ियाें के विविध अलंकारिक पक्षों को समझाते हुए बुनकर जुनैद ने बताया कि हथकरघा पर साड़ी को तैयार करने की तीन तकनीक थी। इसमें से तकनीक गठुआ तो खत्म हो गई, वहीं इसके बाद आई जाला और जकाट तकनीक वर्तमान में चल रही है। कहा कि जकाट एक मशीन है जो कि अतिरिक्त बाने से बनती है। उन्होंने कहा कि पावरलूम की साड़ियों की बुनाई में प्लास्टिक जरी का जबकि हैंडलूम में टेस्टेड जरी का उपयोग होता है। इस दौरान कार्यक्रम में सीमित संख्या में लोग मौजूद थे, जिन्होंने सवाल-जवाब किए।

कोरोना के कारण बीते डेढ़ साल से बनारस व पूर्वांचल के करीब साढ़े चार लाख बुनकर परिवारों को पालने वाला बनारसी वस्त्र कारोबार लगभग ठप है। बुनकरों की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है तो मदद करने वाले हाथ अब थक गए हैं। इस कठिन दौर में कोई पावरलूम तो गहने बेचकर पेट पाल रहा। अनलाक के बाद भी बनारसी साड़ी कारोबार की हालत सुधर नहीं सकी है। करीब 30,000 हथकरघा पर परंपरागत बनारसी साड़ी बुनाई और 90,000 पावरलूम में बनारसी वस्त्रों की बुनाई होती थी। कोरोना काल में तकरीबन 80 फीसद हथकरघा व पावरलूम बंद पड़े हैं।

 

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