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अपने ही घर में बे-घर प्रवासी

सीतापुर : बड़ी मुश्किल है.. घर वापसी तो हो गई लेकिन, समस्याएं तो पीछा छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं हैं। गांवों में झांककर देखिए तो प्रवासियों की घर वापसी के बीच भविष्य की तमाम चिताएं उनके समक्ष खड़ी हैं। राशन कार्ड की समस्या के बाद हमने आशियाने की दिक्कतों को भी देखने की कोशिश की। इस दर्द का अहसास कराने के लिए आज आपको मिश्रिख तहसील के मानपुर गांव ले चलते हैं। यहां पर प्रवासी संतराम का परिवार 25 मई को आया है। संतराम के सात बच्चे हैं। पिछले पांच वर्ष से संतराम परिवार के साथ चंडीगढ़ में रहते थे। वहां पर सिलिडर पर लगने वाले रेग्युलेटर बनाने वाली एक कंपनी में 8500 रुपये महीने पगार पर काम करते थे। लॉकडाउन के दौरान कंपनी बंद रही। ऐसे में न चाहकर भी संतराम को परिवार समेत गांव लौटना पड़ा। उनके अपने घर की कोठरी (कमरा) गिर गई है। भाई का परिवार भी चंडीगढ़ में ही रहता था। ऐसे में अपने सात बच्चों के साथ संतराम दिन में अपने भाई के घर पर रहते हैं। रात अपनी गिरी कोठरी में काटते हैं। कहते हैं कि समझ में नहीं आ रहा है कि बच्चों का पेट कैसे पालेंगे। वापसी के वक्त 35 किलो राशन उन्हें मिला था। यह खत्म होगा तो इंतजाम कैसे होगा, यह पता नहीं। वह मनरेगा में काम करने की सोच रहे हैं।

आ चुके हैं कई 'संतराम'

यह दिक्कत सिर्फ मानपुर के संतराम के समक्ष ही नहीं है। गांव में आए प्रवासियों को बड़े परिवारों के बीच रहने में तमाम मुश्किलें आ रही हैं। छोटे से घर में अचानक से अपनों का आना, इस वक्त मुश्किल जैसा ही लग रहा है। पर, अधिकांश यहीं पर संभावनाएं तलाशने के मूड में हैं।

वर्जन

'अभी आवास के लिए तो कोई दिशानिर्देश नहीं हैं। पात्रों को आवास दिलाने के लिए आवास प्लस सर्वे पूरा हो चुका है। इस समय आधार फीडिग चल रही है। अगले लक्ष्य में आवास प्लस सूची के लाभाíथयों को सत्यापन के बाद आवास दिया जाएगा। अगर कोई नई व्यवस्था बनती है तो उस पर भी काम किया जाएगा।'

- अरुण कुमार सिंह, परियोजना निदेशक डीआरडीए।

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