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गुरू के आर्शीवाद से चीन में लहराया था भारत का झंडा

जागरण संवाददाता, प्रयागराज : गुरु पूर्णिमा पर गुरु-शिष्य की महान परंपरा की यादें अपने आप ताजा हो उठती हैं। इस परंपरा को जीवंतता प्रदान करने वाले कुछ ऐसे सितारे हैं, जिन्हें चमकाने वाले गुरुओं की बात ना की जाए तो बेमानी होगी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर प्रतापगढ़ का नाम रोशन करने वाली एथलीट खुशबू गुप्ता हों या फिर आकाश भट्ट, सौरभ यादव जैसे नए उभरते क्रिकेट के सितारे। इन सभी चमकते खिलाड़ियों का नाम सामने आते ही उनकी प्रतिभा को निखारने वाले गुरुओं का नाम अपने आप जुंबा पर आ जाता है।

शहर की दहिलामऊ की रहने वाली एथलीट खुशबू गुप्ता से कौन अपरिचित है भला। पहली बार स्टेडियम में कदम रखा तो सबसे पहले एथलीट कोच मनोज पाल से ही सामना हुआ। एथलीट खुशबू दैनिक जागरण से इस मौके पर कहती हैं कि वह एक साधारण परिवार से हैं। एक लड़की का एथलेटिक्स में कदम रखना अभी बी इस क्षेत्र के लिए असहज माना जाता हैं। लेकिन उनके गुरु मनोज पाल ने ना सिर्फ उनका मार्गदर्शन किया, बल्कि उनके अंदर के आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ हौसला पैदा किया, उन्हीं की वजह से आज वह सफलता के मुकाम पर हैं। सीमा सुरक्षा बल में कांस्टेबल खुशबू गुप्ता इस समय दिल्ली में तैनात हैं। यूं तो उन्होंने कई जगह सफलता के झंडे गाड़े हैं। सबसे ज्यादा याद है वर्ष 2019 में चीन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पुलिस फायर गेम के महाआयोजन का। इसमें उन्होंने भारत की तरफ से भाग लिया था और तीन किलोमीटर और पांच किलोमीटर की दौड़ में गोल्ड मेडल जीता था। उसी दौरान 300 और 1500 मीटर की दौड़ में सिल्वर भी जीता था, इस तरह से चीन की धरती पर भारत का झंडा शान से लहराने में अर्जित की गई सफलता का वह श्रेय अपने गुरु एवं कोच मनोज पाल को देती हैं। इस पर उनके गुरु मनोज पाल कहते हैं, खुशबू वास्तव में अपने लक्ष्य को लेकर गंभीर थी, उसने वर्ष 2017 में विजयवाड़ा में आयोजित जूनियर नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल लेकर बता दिया था कि उसे सफलता की अनंत यात्रा करनी है। उसकी वजह से देश और जिले का नाम कई बार रोशन होता रहेगा। यह सच है कि खुशबू जैसी शिष्या की ही वजह से गुरुओं का मान रहा है और हमेशा रहेगा।

इसी तरह शहर से सटे कोहड़ा गांव के रहने वाले रणजी ट्राफी खेल चुके आकाश भट्ट कहते हैं उन्हें बचपन से ही क्रिकेट खेलने का धुन सवार था। ऐसे में वह सबसे पहले अपने गुरु डा. मो. शफीक का नाम लेते हैं। कहते हैं कि मो. शफीक ने उन्हें बहुत प्यार से क्रिकेट के वो गुर सिखाए, जिनका कोई जवाब नहीं है। अब वह क्रिकेट कोच आदित्य शुक्ला की देखरेख में अपनी प्रतिभा को निखार रहे हैं। कहते हैं कि एक गुरु ही पूरी तरीके से सही टैलेंट की पहचान कराता है, उसे निखार कर वह अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। आदित्य सर ने ईस्ट जोन की तरफ से प्रो. देवधर ट्राफी से लेकर रण जी ट्राफी तक खेला है। उनसे काफी कुछ सीखने को मिला। कुछ इसी तरह का भाव लिए लरिया गांव के सौरभ यादव कहते हैं कि उनके आदित्य सर काफी साल से उन्हें क्रिकेट के गुर सिखा रहे हैं। हर दिक्कत में वह साथ खड़े मिलते हैं। उन्हीं के मार्ग निर्देशन में मुझमें निखार आया और प्रदेश में अंडर-23 में बीसीसीआइ कर्नल सीके नायडू ट्राफी और अंडर 16 में विजय मर्चेंट ट्राफी खेलने का सौभाग्य मिला। सपना तो बहुत बड़ा है, मगर बिना गुरु के सफलता नहीं मिल सकती। अपने शिष्यों की तरफ से अपने बारे में सुनकर क्रिकेट कोच आदित्य शुक्ला कहते हैं कि उन्होंने हमेशा मेहनत पर जोर दिया है। वह स्वयं ईस्ट जोन की तरफ से प्रो. देवधर ट्राफी से लेकर रणजी ट्राफी खेल चुके हैं। वह चाहते हैं कि उनके शिष्य इंडिया की क्रिकेट टीम में शामिल हों, ताकि जिले और प्रदेश का नाम रोशन हो। कहते हैं, शिष्य का नाम रोशन होने से गुरु का गौरव बढ़ता है। उसी तरह जैसे महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की वजह से उनके गुरु रमाकांत आरचेकर को भी लोग जान पाए। मैं अपने खिलाड़ियों से मेहनत कराकर उनकी प्रतिभा निखार देता हूं, जानता हूं कि क्वालिटी की डिमांड हर जगह है। इस गुरु पूर्णिमा पर अपने सभी शिष्यों को शुभकामना देता हूं कि वे अपना मार्ग प्रशस्त करें।

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