पोषण पुनर्वास केंद्र में कुपोषित बच्चों की नो इंट्री

कुपोषण के शिकार जिले के नौनिहालों की सेहत सुधरने के आसार नहीं दिख रहे हैं। वजह यह है कि जिला मुख्यालय पर संचालित होने वाले 10 बेड के पोषण पुनर्वास केंद्र में कुपोषित बच्चों की इंट्री रोक दी गई है। स्टाफ की कमी व केंद्र को कहीं और ले जाने की कवायद में बच्चों पर यह संकट मंडराया है।

JagranFri, 18 Jun 2021 10:43 PM (IST)
पोषण पुनर्वास केंद्र में कुपोषित बच्चों की नो इंट्री

जासं, प्रतापगढ़ : कुपोषण के शिकार जिले के नौनिहालों की सेहत सुधरने के आसार नहीं दिख रहे हैं। वजह यह है कि जिला मुख्यालय पर संचालित होने वाले 10 बेड के पोषण पुनर्वास केंद्र में कुपोषित बच्चों की इंट्री रोक दी गई है। स्टाफ की कमी व केंद्र को कहीं और ले जाने की कवायद में बच्चों पर यह संकट मंडराया है।

शासन कुपोषण दूर करने पर बहुत जोर देर रहा है। इसके लिए जिला कार्यक्रम अधिकारी और सीएमओ को सीधे जवाबदेह बनाया गया है। एक पर बच्चों को चिह्नित करने व दूसरे पर उपचार के लिए भर्ती कराने की जिम्मेदारी है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों का वजन करके उनको कुपोषित व अति कुपोषित की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे बच्चों में से कुछ को पोषण केंद्र में महीने भर भर्ती करके बेहतर खानपान, उपचार, मनोरंजन के जरिए स्वस्थ किया जाता है। इन दिनों ऐसा नहीं हो पा रहा है। मेडिकल कालेज परिसर में स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में केवल एक महिला कर्मी ही नजर आती है। बच्चे भर्ती न किए जाएं, इस तरह का मौखिक फरमान जारी होने के कारण भर्ती महीने भर से बंद है। सारे बेड खाली हैं। यहां पर भर्ती बंद होने की खबर आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंचने से वहां से बच्चे नहीं लाए जा रहे हैं। साथ ही अंदरखाने से पता चला कि इस केंद्र को कहीं और शिफ्ट करने की तैयारी है। तब तक भर्ती नहीं की जा रही है। ऐसे में नई व्यवस्था होने तक बच्चों का क्या होगा, इसे बताने वाला कोई नहीं है।

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62 हजार बच्चे चिह्नित

जिले में मौजूदा समय में 62 हजार बच्चे कुपोषण के दायरे में हैं। इनमें से 45 हजार कुपोषित व बाकी अति कुपोषित श्रेणी में रखे गए हैं। इनको आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से दलिया, देसी घी, दूध, चने की दाल समेत कई तरह की सामग्री दी जाती है, ताकि वह स्वस्थ हो सकें। अतिकुपोषित गंभीर बच्चों को पोषण केंद्र में भर्ती कराने का निर्देश है।

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सालभर से उधार के चिकित्सक

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से इस केंद्र का संचालन होता है। इतनी समृद्ध संस्था का केंद्र होकर भी यहां स्थाई बाल रोग चिकित्सक नहीं हैं। एक साल से अस्पताल के उधार के चिकित्सक से काम चलाया जा रहा है। ऐसे में जब बच्चे भर्ती होते थे तो भी उनका समुचित परीक्षण नहीं हो पाता था।

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भर्ती रोकी नहीं गई है। कोरोना के डर से लोग अपने बच्चों को ला नहीं रहे हैं। बच्चे नहीं आने पर वहां के स्टाफ को दूसरे स्थान पर कार्य में लगाया गया है।

-डा. सुरेश सिंह,सीएमएस राजकीय मेडिकल कालेज

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