पीलीभीत से बांस ले जाकर बनाई बांसुरी ने विदेशों तक दिलाई पहचान

पीलीभीतजेएनएन स्पिक मैके के तत्वावधान में बुधवार को आयोजित हुए बांसुरी वादन कार्यक्रम के लिए पधारे विश्व विख्यात बांसुरी वादक पंडित राजेंद्र प्रसन्ना बांसुरी नगरी में प्रस्तुति देकर बेहद खुश नजर आए। उन्होंने कहा कि हम पीलीभीत से बांस ले जाकर बांसुरियां बनाते हैं। यहां के बांस से बनी बांसुरी देश-विदेश में बजाकर श्रोताओं के दिल में जगह बना रहे हैं। मूल रूप से बनारस में जन्मे पंडित राजेंद्र प्रसन्ना को साहित्य नाटक अकादमी पुरस्कार व ग्रैमी अवार्ड सर्टिफिकेट जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। दैनिक जागरण से खास बातचीत के प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश।

JagranThu, 28 Oct 2021 12:06 AM (IST)
पीलीभीत से बांस ले जाकर बनाई बांसुरी ने विदेशों तक दिलाई पहचान

पीलीभीत,जेएनएन: स्पिक मैके के तत्वावधान में बुधवार को आयोजित हुए बांसुरी वादन कार्यक्रम के लिए पधारे विश्व विख्यात बांसुरी वादक पंडित राजेंद्र प्रसन्ना बांसुरी नगरी में प्रस्तुति देकर बेहद खुश नजर आए। उन्होंने कहा कि हम पीलीभीत से बांस ले जाकर बांसुरियां बनाते हैं। यहां के बांस से बनी बांसुरी देश-विदेश में बजाकर श्रोताओं के दिल में जगह बना रहे हैं। मूल रूप से बनारस में जन्मे पंडित राजेंद्र प्रसन्ना को साहित्य नाटक अकादमी पुरस्कार व ग्रैमी अवार्ड सर्टिफिकेट जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। दैनिक जागरण से खास बातचीत के प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश। प्रश्न: बांसुरी नगरी में कार्यक्रम का कैसा अनुभव रहा।

उत्तर: मुझे जानकर बहुत खुशी हुई कि पीलीभीत को बांसुरी नगरी की संज्ञा दी गई है। हम लोग बचपन से अब तक यहां के बांस ले जाकर बांसुरी बनाया करते हैं। भगवान कृष्ण की कृपा है कि पीलीभीत में बांसुरी वादन व श्रवण के प्रति इतना प्रेम देखने को मिला। आज तीसरी बार यहां आना हुआ और हर बार से ज्यादा बेहतर अनुभव हो रहा है। प्रश्न: बांसुरी वादन की तऱफ रुझान कैसे हुआ।

उत्तर: यह हमारे पुश्तैनी संस्कार हैं। दादा-परदादा से लेकर पिता जी व अब मेरा बेटा वादन से जुड़े हैं। शहनाई से शुरुआत हुई उसके बाद गुरुओं के सानिध्य में बांसुरी सीखी और आज उसी से पहचान बनी हुई है। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जैसे बांसुरी वादकों ने भी हमारे घराने से ही सीखा। प्रश्न: शास्त्रीय संगीत में लोगों की कितनी रुचि देखते है।

उत्तर: एक कहावत है- नया नौ दिन, पुराना सौ दिन। ऐसा ही शास्त्रीय संगीत को लेकर है। अधिकांश नए गानों को आप दो या तीन बार से अधिक नहीं सुनेंगे लेकिन पुराने गानों को रिपीट मोड में बार बार सुनते हैं। यह उनकी लय, धुन व ताल की सौम्यता के कारण है। शास्त्रीय संगीत के प्रति युवाओं का रुझान देखने लायक है। स्कूल-कालेजों में आयोजित कार्यक्रम में युवा बच्चे मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं। विदेशों में हमारे संगीत को बहुत पसंद किया जा रहा है। 2004 में पहली बार नार्वे गया था। उसके बाद से लगातार विदेशों से कार्यक्रम के लिए आमंत्रण आ रहे हैं। इसका मतलब है कि हमारी संस्कृति के मूल्य पूरे विश्व को सीख दे रहे हैं जिनसे वह आनंदित हो रहे हैं और उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं। प्रश्न: तकनीकी के युग में शास्त्रीय संगीत को कितना लाभ हुआ है।

उत्तर: तकनीकी से शास्त्रीय संगीत को लाभ हुआ है। कोरोना काल में विभिन्न वीडियो काल एप के माध्यम से कार्यक्रम संपन्न हुए। यूट्यूब व अन्य सोशल साइटों के माध्यम से हम लोग घर बैठे श्रोताओं तक पहुंच बना पाने में सफल हुए हैं। लोगों में शास्त्रीय संगीत के प्रति समझ बढ़ी है। प्रश्न: युवाओं व नए सीखने वालों को क्या संदेश देना चाहेंगे।

उत्तर: सीखने अथवा वादन में रुचि रखने वालों को प्रमुख संदेश यही है कि गुरु की खोज करें व गुरु के सानिध्य में ही सीखें। अधिक से अधिक रियाज पर ध्यान दें। किसी शार्टकट के पीछे न भागें। मैं कई बच्चों को निश्शुल्क सिखाता हूं। यह मां शारदे का आशीष है। इसे जितना बांटेंगे, उतना आगे बढ़ेगा। आजकल विभिन्न एप आ गए हैं लेकिन उससे सीखने का उद्देश्य पूरा नहीं होता। गलती में सुधार केवल गुरु ही करा सकता है, कोई एप नहीं।

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