मोतीलाल को विरासत में मिला मूर्तियां बनाने का हुनर

पीलीभीतजेएनएन माटी कला से परिवार का भरण पोषण मोती लाल का परिवार पिछली दो पीढि़यों से कर रहा है। आधुनिक चकाचौंध में लोग भले ही दूसरे धंधों से जुड़े हैं परंतु यह परिवार अपने पुश्तैनी कार्य को बखूबी कर रहा है। हर साल दीपावली पर मिट्टी की मूर्तियों को बनाकर उसे परंपरागत तरीके से पकाकर बाजार में बिक्री करते हैं।

JagranWed, 27 Oct 2021 12:08 AM (IST)
मोतीलाल को विरासत में मिला मूर्तियां बनाने का हुनर

पीलीभीत,जेएनएन: माटी कला से परिवार का भरण पोषण मोती लाल का परिवार पिछली दो पीढि़यों से कर रहा है। आधुनिक चकाचौंध में लोग भले ही दूसरे धंधों से जुड़े हैं परंतु यह परिवार अपने पुश्तैनी कार्य को बखूबी कर रहा है। हर साल दीपावली पर मिट्टी की मूर्तियों को बनाकर उसे परंपरागत तरीके से पकाकर बाजार में बिक्री करते हैं।

विकासखंड क्षेत्र के ग्राम कर्रखेड़ा निवासी माटी के शिल्पकार मोतीलाल बताते हैं कि पहले उनके दादा हीरालाल इस व्यवसाय को करते थे। उनकी मृत्यु के बाद पिता नंदलाल ने इस कला में अच्छी महारत हासिल की थी। आसपास के कई ग्रामों के ग्रामीण उस समय उनके पिता द्वारा तैयार किए गए मिट्टी के बर्तनों की खरीदारी करने आया करते थे। दीपावली पर्व पर पूरा परिवार इस कार्य में जुट जाता था और अच्छी कमाई होती थी। पिता की मृत्यु होने के बाद से वह इस पुश्तैनी कार्य से जुड़े हुए हैं। हालांकि इसमें सीमित आमदनी होने के कारण परिवार चलाने में कठिनाई हो रही है परंतु पूर्वजों से मिले हुनर को छोड़ना भी नहीं चाहते। दीपावली के लिए इस बार भी उन्होंने परिवार की मदद से मिट्टी के बर्तन, मूर्तियां व दीये तैयार किए हैं। कस्बा के बाजार में इनकी बिक्री में करनी शुरू कर दी है। कोरोना संकटकाल के चलते पिछले वर्ष धंधे में मंदा छाया रहा परंतु इस बार उन्हें अच्छी आमदनी होने की उम्मीद है। सरकार ने उन्हें इलेक्ट्रानिक चाक भी उपलब्ध करा दिया है, जिससे मांग के अनुसार माल तैयार करने में आसानी हो रही है। माल तैयार करने के लिए उन्हें पहले तालाब से उपयुक्त मिट्टी लानी पड़ती है। उसे कूटकर अच्छी तरह से तैयार करते हैं। चाक की मदद से माल तैयार करते हैं। मिट्टी की मूर्तियां बनाने में कठिनाई होती है। इसके लिए कुछ सांचे भी बनवा रखे हैं। जिनकी मदद से मूर्तियों को तैयार करने के बाद उनमें रंग रोगन का कार्य होता है। परिवार की महिलाएं इस कार्य में उनका सहयोग करती हैं। माल तैयार हो जाने के बाद बिक्री के लिए उसे शहर लेकर जाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि अभी तक चीन के दीयों की काफी मांग थी लेकिन अब लोग स्वदेशी पसंद करने लगे हैं।

मोतीलाल बताते हैं कि उन्हें माटी कला से काफी प्रेम है। इसलिए जब तक उनके शरीर में ताकत बनी रहेगी, वह इस व्यवसाय करते रहेंगे। अपनी नई पीढ़ी को भी यह कार्य करने को प्रेरित करते रहेंगे।

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