सौहार्द देखना है तो सम्भल आइए, आमने-सामने मंदिर और मस्जिद लेकिन, कभी नहीं हुआ विवाद

शहर के कोट पूर्वी मोहल्ला स्थित मंदिर-मस्जिद। जागरण
Publish Date:Fri, 23 Oct 2020 11:11 AM (IST) Author: Vivek Bajpai

 सम्भल (राघवेंद्र शुक्ल): शहर के कोट पूर्वी मोहल्ला में एक ही जगह पर रानी वाला मंदिर तो दूसरी ओर एक रात वाली मस्जिद भी है। दोनों धर्म स्थलों के बीच केवल एक सड़क है जो 15 से 20 फीट की है। यह रोड ही इन दोनों धाॢमक स्थल को अलग करती है। हालांकि इस जगह पर न तो कभी पूजा या नमाज के लिए विवाद हुए और न ही कोई तनाव फैला। एक तरफ मंदिर के घंट घडिय़ाल बजते हैं तो दूसरे ओर अजान। न एक को दूसरे से दिक्कत न दूसरे को पहले से। कई बार शहर की स्थिति बिगड़ी लेकिन, यहां न पूजा पर असर पड़ा न अजान के दौरान कोई व्यवधान। 

मोहल्ला कोट पूर्वी के पास मिश्रित आबादी है। पर सबको अपने अपने धर्म के हिसाब से पूजा पद्धति का अधिकार है। सब स्वतंत्र रूप से सांप्रदायिक एकता, सद्भाव और प्रेम का अनूठा उदाहरण पेश करते हैं। धाॢमक भावनाओं को भड़काने को यहां के लोग नकारते हैं। जाति धर्म में बांटने का किसी ने प्रयास किया तो उसे भी मुंह की खानी पड़ती है। रानी वाला मंदिर यानी कल्कि मंदिर और एक रात वाली मस्जिद का आमने सामने होना भी आपसी सौहार्द की मिसाल है। मंदिर में सुबह शाम आरती की जाती है, घंटे घडिय़ाल बजाते हैं, भजन कीर्तन भी किये जाते हैं। नगर के अलावा देश के कई प्रांतों के लोग कल्कि मंदिर में दर्शन को आते हैं। नगर के प्रसिद्ध मंदिरों में पूजा अर्चना कर सुख शांति की कामना करते हैं। वहीं मस्जिद में पांच वक्त की अजान लगाकर नमाज अदा की जाती है।

अमीर खान ने एक रात में बनवाई थी मस्जिद

उत्तर भारत में 1801 में अंग्रेजों के साथ युद्ध में नवाब शुजाउद्दौला की पराजय के बाद टोंक के जागीरदार नवाब अमीर खान सम्भली ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। 1805 में नवाब अमीर खान सम्भली ने मराठा फौज के साथ मिलकर रूहेलखंड के पश्चिमी भाग में आक्रमण कर दिया। अमरोहा के करीब कैप्टन मरे की फौज से वह हार गया। उधर मराठा फौज भी अफजलगढ़ पहुंच गई। अमीर खान ने फिर मराठों के साथ मिलकर मुरादाबाद में विजय हासिल की। सम्भल के मनोकामना तीर्थ की ओर से सम्भल नगर में प्रवेश किया। मनोकामना रोड पर मोहल्ला कोट पूर्वी के दायीं ओर मराठा तथा बायीं ओर अमीर खान की फौज ने डेरा डाला। फौजी कैंप की ओर अमीर खान ने रातों रात एक मस्जिद का निर्माण कराया। इसलिए इस मस्जिद का नाम एक रात वाली मस्जिद पड़ा। (प्रिंसिपल एम उस्मान की किताब - कठेर रूहेलखंड पश्चिमी भाग किताब के पृष्ठ संख्या 195 से लिया गया।)

 रानी अहिल्याबाई की स्मृति में हुआ था मंदिर का निर्माण

वर्ष 1773 में होलकर रानी अहिल्याबाई राज्यकाल 1766-1796 का सम्भल पर अधिकार रहा था। इस दौरान अहिल्याबाई मनोकामना रोड पर कोट पूर्वी जाने वाले मोड़ के दायीं ओर ठहरीं थीं। उनके जाने के बाद वर्ष 1805 में होलकर शासक के आदेश पर मराठा सरदार ने यहां रानी अहिल्याबाई के स्मृति में रानी वाले मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर पर लोगों की आस्था है। इस मंदिर पर भगवान श्री कल्कि विराजमान हैं। इस मंदिर में लोगों की श्रद्धा है और हर दिन लोग मंदिर में दर्शन कर पुण्य लाभ कमाते हैं।

क्या कहते हैं पुजारी और मौलाना

पुजारी महेंद्र शर्मा कहते हैं कि कल्कि मंदिर प्राचीन है। लोगों की मंदिर पर आस्था है। भगवान श्री कल्कि के पूजन के साथ ही यहां लोग अपनी मन्नतें मांगते हैं। भगवान शिव का मंदिर में हर दिन जलाभिषेक भी होता है। वहीं मौलाना फैजान अशरफ कहते हैं कि सम्भल के लोग अमन पसंद हैं। एक रात वाली मस्जिद में मुस्लिम समाज की श्रद्धा है और मंदिर और मस्जिद के बीच केवल एक सड़क का ही फासला है। पर यह क्षेत्र सद्भाव का मिसाल है।

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