Amroha Bawankhedi Massacre : शबनम-सलीम को फांसी के फंदे तक ले गई तथ्यात्मक विवेचना और 28 लोगों की गवाही

शबनम ने नहीं बनाया था अपना कोई गवाह। मुकर गए थे सलीम के दोनों गवाह।

नापाक मोहब्बत में नाकाम होने पर प्रेमी सलीम के साथ मिलकर अपने ही परिवार के सात लोगों का कत्ल करने वाली शबनम के कदम आखिर फांसी के फंदे की तरफ कानूनी प्रक्रिया में कैसे पहुंचे इसे जानने को भी लोग उत्सुक हैं।

Narendra KumarThu, 25 Feb 2021 12:10 PM (IST)

मुरादाबाद, जेएनएन। अमरोहा बावनखेड़ी नरसंहार का पर्दाफाश करना पुलिस के लिए चुनौती था। चूंकि इस मामले में कोई चश्मदीद नहीं था। परिस्थितिजनक साक्ष्य के आधार पर पुलिस ने एक के बाद एक कड़ी जोड़ी। विवेचक आरपी शर्मा द्वारा तथ्यात्मक विवेचना व 28 लोगों की गवाही सलीम व शबनम को दोषी करार कराने में महत्वपूर्ण रही। इसके चलते दोनों को फांसी के फंदे तक पहुंचाया जा सका। हालांकि इस मामले में सलीम द्वारा पेश किए गए दो गवाह मुकर गए थे। जबकि शबनम की तरफ से कोई गवाह ही पेश नहीं किया गया था।

हसनपुर के बावनखेड़ी की खूनी प्रेम कहानी 13 साल बीतने के बाद भी लोगों के दिलो-दिमाग पर आज भी ताजा है। जिक्र आते ही लोग शबनम सलीम के बारे में जानकारी करने को उत्सुक हो जाते हैं। चूंकि अब शबनम को फांसी दिए जाने का मामला काफी चर्चा में रहा है। ऐसे में देशभर के लोग इस मामले को लेकर पल-पल की जानकारी ले रहे हैं। नापाक मोहब्बत में नाकाम होने पर प्रेमी सलीम के साथ मिलकर अपने ही परिवार के सात लोगों का कत्ल करने वाली शबनम के कदम आखिर फांसी के फंदे की तरफ कानूनी प्रक्रिया में कैसे पहुंचे, इसे जानने को भी लोग उत्सुक हैं। पुलिस द्वारा अदालत में दाखिल की गई केस डायरी के मुताबिक इस नृशंस हत्याकांड में 28 गवाह सामने आए थे। विवेचक आरपी गुप्ता ने तथ्यात्मक विवेचना कर 28 ठोस गवाह भी जुटाए थे। इनमें मुकदमे के वादी लतीफुल्ला, हशमत हुसैन, लाल मोहम्मद, महेंद्र सिंह, निश्चल त्यागी, बिलाल अहमद, सुख्खन अली, रईलस अहमद, फरीद उर्फ बॉबी, साजिद अली, मोबीन हुसैन, नूर मोहम्मद, सईद अहमद के अलावा डॉ. वंदना, कांस्टेबिल मनवीर सिंह, वीरेंद्र सिंह, एसआइ गणेशदत्त जोशी, मदनपाल, दिनेश कुमार सिंह, संजय कुमार, कमवीर सिंह, पूर्व विवेचक बाबूराम सागर, विवेचक आरपी गुप्ता, डॉ. दीवानराम, डॉ. जगमाल सिंह, शेलेंद्र कुमार, पंकज शर्मा व चंद्रप्रकाश शर्मा शामिल हैं। हैरत की बात तो यह है कि शबनम ने अपने बचाव में कोई गवाह पेश करने की कोशिश ही नहीं की थी। हां, सलीम ने जरूर दो गवाह पेश किए थे, परंतु बाद में वह भी मुकर गए थे। 

कॉल डिटेल को माना था अहम सुबूत

तत्कालीन जिला जज सैयद आमिर अब्बास हुसैनी ने शबमन व सलीम को फांसी की सजा सुनाने से पहले सुनवाई के दौरान दोनों के बीच मोबाइल पर हुई बात पर गंभीरता से बहस कराई थी। दोनों के पास से बरामद मोबाइल की कॉल डिटेल को अहम सुबूत माना था। क्योंकि दो महीना की कॉल डिटेल पुलिस के पास अहम सुबूत रहा था। 

घटना स्थल खुद दे रहा था गवाही

बावनखेड़ी नरसंहार के विवेचक आरपी शर्मा बताते हैं कि तथ्यात्मक रूप से विवेचना को मजबूत बनाने के लिए गवाह जुटाना भी बड़ी चुनौती था। परंतु घटना स्थल खुद सबसे बड़ी गवाही दे रहा था। चारपाइयों पर पड़े रक्तरंजित शव व दीवारों पर भी खून की छींटों का मंजर भयावाह था। यह घटना मानवता व रिश्तों को शर्मशार करने वाली घटना थी। सलीम व शबनम का कृत्य फांसी की सजा लायक ही था।

 

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