देसी गाय से दुनियाभर में संभव है जीरो बजट खेती, सीखें खेती का नया ककहरा Meerut News

कृषि विशेषज्ञ पद्मश्री सुभाष पालेकर ने कहा एक एकड़ जमीन में खेती करने के लिए 11 किलो गोबर पर्याप्‍त है।

By Taruna TayalEdited By: Publish:Sat, 21 Sep 2019 11:25 AM (IST) Updated:Sat, 21 Sep 2019 11:25 AM (IST)
देसी गाय से दुनियाभर में संभव है जीरो बजट खेती, सीखें खेती का नया ककहरा Meerut News
देसी गाय से दुनियाभर में संभव है जीरो बजट खेती, सीखें खेती का नया ककहरा Meerut News

मेरठ, [जागरण स्‍पेशल]। कृषि विशेषज्ञ पद्मश्री सुभाष पालेकर ने कहा, देसी गाय से पूरी दुनिया में जीरो बजट की खेती संभव है। खेती की इस पद्धति को भारत समेत अन्य देशों में भी अपनाया जा सकता है। पूरे विश्व को जीरो बजट खेती सिखा रहे पद्मश्री सुभाष पालेकर शुक्रवार को चौ. चरण सिंह विवि. में आयोजित किसान प्रशिक्षण शिविर में विशेषज्ञ और मुख्य वक्ता के तौर पर पहुंचे थे। इसी दौरान प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि एक देसी गाय रोजाना औसतन 11 किलो गोबर देती है। 11 किलो गोबर से एक एकड़ जमीन में जीरो बजट की खेती करना संभव है। इस तरह 30 दिन के गोबर से 30 एकड़ जमीन में खेती हो सकती है। उन्होंने देसी गाय के गोबर व मूत्र से भू-पोषक द्रव्य ‘जीवामृत’ बनाने का तरीका भी किसानों को सिखाया।

खेती का नया ककहरा सिखा गए पदमश्री पालेकर

देश-विदेश के कृषि विश्वविद्यालयों से खेत खलिहानों तक चर्चा में रहने वाले पदमश्री सुभाष पालेकर ने शुक्रवार को मेरठ में एक दिवसीय प्राकृतिक कृषि प्रशिक्षण शिविर को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित किया। पालेकर ने जीरो बजट की खेती के साथ देशी गाय के गुण व उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रासायनिक कृषि के दुष्प्रभाव ने पूरी दुनिया को चपेट में ले लिया है। उन्होंने पूर्ण रूप से देशी गाय, उसके गोबर व मूत्र से भू-पोषक द्रव्य ‘जीवामृत बनाने का तरीका भी किसानों को बताया। चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय के सुभाष चंद्र बोस प्रेक्षागृह में लोक भारती की ओर से आयोजित कार्यक्रम में प्रशिक्षण कार्यक्रम दो सत्र में संपन्न हुआ। सुबह के सत्र में कुलपति एनके तनेजा, जबकि शाम को शोभित विश्वविद्यालय के कुलपति एपी गर्ग ने अध्यक्षता की। पालेकर ने कहा कि एक देशी गाय दिन में औसतन 11 किलो गोबर देती है। इससे एक एकड़ की खेती आसानी से जीरो बजट पर की जा सकती है। इसी तरह 30 दिन में 30 एकड़ की खेती हो सकती है। उन्होंने किसानों से दिमाग से दवा व खाद निकालकर देशी गाय को बसाने के लिए अपील की। देशी गाय आधारित खेती प्राकृतिक व्यवस्था पर निर्धारित है।

सुभाष पालेकर: एक परिचय

देश-विदेश के कृषि विश्वविद्यालयों से लेकर खेत खलिहानों तक आजकल सुभाष पालेकर की चर्चा है। किसानों के बीच ‘कृषि ऋषि’ के रूप में पहचान बना चुके पालेकर अमरावती (महाराष्ट्र) के मूल निवासी हैं। वह बताते हैं कि कृषि स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने गांव में 15 साल तक खेती की। रासायनिक पद्धति की खेती करने के बाद भी जब उत्पादन नहीं बढ़ा तो उन्हें चिंता सताने लगी। इसका कारण जानने के लिए वह जंगलों में निकल गए। वहां उनके दिमाग में सवाल कौंधा कि जंगल में पेड़ बिना रासायनिक खाद के हरे-भरे रह सकते हैं तो हमारे खेतों में क्यों नहीं। इसी के बाद उन्होंने जीरो बजट खेती पर अनुसंधान शुरू किया। 

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