UP: सात साल बाद जीती कानूनी जंग, अब पत्‍नी देगी एक हजार रुपये मासिक गुजारा भत्‍ता

मुजफ्फरनगर के किशोरी लाल अब अपनी पत्‍नी से हर माह 1000 रुपये लेने के हकदार होंगे।
Publish Date:Fri, 23 Oct 2020 11:11 AM (IST) Author: Prem Bhatt

मुजफ्फरनगर, जेएनएन। यह अपने ही तरह का एक अलग मामला है। गुजारा भत्ता का भुगतान किए जाने की पति की याचिका पर परिवार न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर पत्नी को हजार रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है। अब आदेश के बाद पत्‍नी अपने पति को प्रतिमाह एक हजार रुपये गुजारा भत्‍ता देंगी।

सात साल तक चली सुनवाई

खतौली के नागर कॉलोनी निवासी किशोरी लाल सोनकर का विवाह 1990 में कानपुर निवासी मुन्नी देवी के साथ हुआ था। मुन्नी देवी कानपुर स्थित रक्षा अनुसंधान विकास संगठन में चतुर्थ श्रेणी पद पर कार्यरत थी। 1999 में दोनों के बीच मनमुटाव होने पर किशोरी लाल खतौली लौट आए थे। कुछ माह पूर्व मुन्नी देवी भी नौकरी से सेवानिवृत्त हो गई। वर्ष 2013 में बेरोजगार किशोरी लाल ने परिवार न्यायालय दो में प्रार्थना पत्र देकर नौकरी पेशा पत्नी मुन्नी देवी से गुजारा भत्ता का भुगतान कराने की गुहार लगाई थी। सात साल तक चली सुनवाई के बाद मंगलवार को परिवार न्यायालय- दो कि न्यायाधीश तृप्ता चौधरी ने आदेश जारी किया की मुन्नी देवी प्राप्त होने वाली ₹12000 प्रतिमाह पेंशन की धनराशि में से गुजारा भत्ता के रूप में ₹1000 प्रति माह का भुगतान पति किशोरीलाल को करें।

2013 से भुगतान चाहते हैं किशोरीलाल

परिवार न्यायालय के फैसले से नाखुश किशोरी लाल का कहना है कि उन्होंने गुजारा भत्ता की मांग के लिए 2013 में न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिया था। कहा कि ₹1000 प्रति माह से उनका कुछ होने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि वह कोर्ट से मांग करेंगे कि गुजारा भत्ता की धनराशि उन्हें 2013 से ही दिलाई जाए।

झूठे मुकदमे में बरी हो चुके किशोरी लाल

किशोरी लाल ने बताया कि उनकी पत्नी मुन्नी देवी ने कानपुर के कोर्ट में उनके विरुद्ध झूठा मुकदमा दायर किया था। जिसमें उसने उन पर दूध में जहर मिलाकर पिलाने का आरोप लगाया था। लेकिन कोर्ट ने सुनवाई कर उन्हें बरी कर दिया था।

भूख मिटाने को कर ली चाय की दुकान

किशोरी लाल का कहना है कि उनकी पत्नी रोजगार पर थी और वह घर का काम संभालते थे। लेकिन पत्नी से अलग होने के बाद उन्हें रोटी के भी लाले पड़ गए थे। कई कई दिन भूखा रहना पड़ता था। परिवार न्यायालय में उन्होंने गुजारा भत्ता भुगतान की गुहार लगाई थी। लेकिन सुनवाई लंबी चलने के कारण मजबूर होकर उन्हें चाय की दुकान खोल कर ही पेट पालना पड़ा।

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