अनहद : ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं, हाल के भीतर अकेले सिनेमा देखने का आनंद Meerut News

मेरठ शहर में भले ही सिनेमाहाल खुल गए हैं, लेकिन दर्शक नहीं मिल रहे।

कोरोनाकाल में अब मेरठ शहर में भी सिनेमाओं को भी खोलने की अनुमित मिल चुकी है। यकीन मानिए थिएटर में अकेले चौड़े होकर सिनेमा देखने का मजा अद्वितीय है। ...और कोरोना? सवाल पूरा होता उससे पहले ही जवाब तैयार। बोले सरकार संजीदा है।

Publish Date:Sat, 31 Oct 2020 09:30 AM (IST) Author: Prem Bhatt

मेरठ, [रवि प्रकाश तिवारी]। सिनेमाहाल खुल गए हैं, लेकिन दर्शक नहीं मिल रहे। कभी दो तो कभी चार। ऐसे ही एक शो में इंटरवल के दौरान जब इकलौते दर्शक निकले तो पूछा गया, पूरे हाल में अकेले? चेहरे पर असीम संतोष का भाव लिए जवाब दिया, सिनेमा में ही देखा था कि हीरो पूरा हाल बुक करा लेता है। आखिर इसका मजा क्या होगा, कोरोना ने रील लाइफ को रीयल में जीने का मौका दिया तो जी रहे हैं। यकीन मानिए, थिएटर में अकेले चौड़े होकर सिनेमा देखने का मजा अद्वितीय है। ...और कोरोना? सवाल पूरा होता, उससे पहले ही जवाब तैयार। बोले, सरकार संजीदा है। अगर सेफ न होता तो क्या सिनेमाहाल खुलते? और, कहां इतना रिस्क नहीं है? सवाल के प्रतिउत्तर में दर्शक के सवाल ने सोचने पर मजबूर कर दिया ...क्या इसीलिए ही कहा गया है, बहादुरी और दीवानगी में बड़ा ही महीन फर्क होता है।

जब मिले यार सब बारी-बारी

त्रिवेणी नगरी में गुरुवार को मेरठ के गुरुजी लोगों का संगम कुछ खास रहा। खास इसलिए कि सभी गुरुजी यही मानकर गए थे कि प्राचार्य बनाने वाली गंगारूपी परीक्षा में अकेले डुबकी लगाएंगे, लेकिन एक-एक कर जब जमा होने लगे तो एक-दूसरे की पोल खुलने लगी। दरअसल प्रयागराज में खाली पड़े प्राचार्य पदों पर नियुक्ति के लिए परीक्षा थी। इसमें कुछ ऐसे भी थे जो कालेज प्रबंधन की गुडबुक में रहकर कार्यवाहक की कुर्सी पर काबिज हैं। अब जब ये परीक्षा केंद्र पर एक-एक कर पहुंचने लगे तो मानों किसी हास्य धारावाहिक के दृश्य-सा माहौल खड़ा हो गया। जब भी कोई नया आता, बाकी सभी उसे देखकर मुस्कुराते। बाद में जब भेद खुल ही गया और वहां पहुंचने वाले गुरुजनों की गिनती शुरू की गई तो कोरोना काल में भी अकेले मेरठ कालेज से पहुंचने वालों की संख्या 41 छू गई। बाकी किसी कालेज से चार, कहीं से सात।

डाक्टर मांगे अलादीन का चिराग

एक डाक्टर साहब को उनके एक तांत्रिक मरीज ने एक दिन अलादीन के चिराग के बारे में बताया। उन्होंने ठीक से समझ लिया कि चिराग से जिन्न निकलेगा, और उनकी समस्याओं को छू-मंतर कर देगा। जब से डाक्टर साहब ने इस चिराग के बारे में सुना, अधीर हो गए। दिन में भी सपना देखने लगे, जो हुक्म मेरे आका कहने वाला जिन्न उनकी सेवा में खड़ा है। आखिरकार डेढ़ करोड़ का बंदोबस्त किया और सोने का रंग चढ़े चिराग का सौदा कर लिया। तांत्रिक का मंत्र डाक्टरी विद्या पर भारी पड़ चुका था। फिर क्या था, चिराग बेचने के बाद तांत्रिक ने डाक्टर का इलाज भी शुरू कर दिया। यह घटना इन दिनों डाक्टर बिरादरी के बीच चर्चा का विषय है। वे इन डाक्टर का मनोविज्ञानी से इलाज कराने की सलाह दे रहे हैं। आखिर दें भी क्यों न, मामला पेशे की साख का है।

मुलायम पर लिया कठोर निर्णय

राजनीति में दोस्त और दुश्मन स्थायी नहीं होते। आदर्श भी बदलते रहते हैं। समय-समय पर इसका साक्षात उदाहरण भी खादीधारी दिखाते रहे हैं। मेरठ में भी इन दिनों आदर्श से किनारा करने का मामला सुॢखयों में है। राजनीति के अखाड़े के धुरंधर पहलवान मुलायम सिंह यादव जब सशक्त थे तो उनके नाम पर शहर के सभ्रांत अग्रवाल परिवार ने मेडिकल कालेज खोल दिया। भले मुलायम सिंह का चिकित्सा विज्ञान से कोई नाता न था, फिर भी राजनीति विज्ञान के धुरंधर का खूब मान रखा, लेकिन जैसे ही साइकिल पंक्चर हुई, अग्रवाल परिवार ने कमल थामा। अब भगवा माहौल में मुलायम नाम खटकने लगा, लिहाजा नाम ही बदल डाला, लेकिन कहते हैं न, दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है। लिहाजा इस परिवार ने संशोधित नाम किसी दक्षिणपंथी विचारक के नाम पर न रखकर, क्षेत्र विशेष को तवज्जो दी है।

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