चिंताजनक : मेरठवासियों के फेफड़ों को बीमार बना रही ओजोन गैस, आंकड़े देख आप भी रह जाएंगे दंग Meerut News

मेरठ, [संतोष शुक्ल]। 50 किमी ऊपर रहकर सूरज की घातक अल्ट्रावायलेट किरणों से हमारी जान बचाने वाली ओजोन अगर सांस में घुलने लगे तो यह जहर है। 2016 से 2019 के बीच दिल्ली में कहर ढाने वाली विषाक्त ओजोन गैस मेरठ की सांसों में फंदा कस रही है। फेफड़ों को जख्मी करने वाली ओजोन-03 का स्तर एनसीआर-मेरठ में तेजी से बढ़ा है। पुराने डीजल वाहनों के धुआंधार संचालन और औद्योगिक गतिविधियों से स्थिति भयावह हो रही है।

कैसे बढ़ रही है ओजोन

वाहनों और उद्योगों से रोजाना बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड एवं नाइट्रस ऑक्साइड गैस उत्सर्जित होती है, जो रासायनिक संयंत्रों, वाहनों, रिफाइनरियों से निकलने वाले हाइड्रोकार्बन यानी वोल्टाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड के संपर्क में धूप में केमिकल रिएक्शन कर ओजोन बनाते हैं। इसे विषैली गैस माना जाता है। वायुमंडल में ओजोन 10 से 50 किमी की ऊंचाई पर होती है, किंतु दस किमी से नीचे सांस की परत में पहुंचने से ब्रांकाइटिस, अस्थमा जैसी बीमारियां हो रही हैं।

सावधान करते हैं ये आंकड़े

सर्दी आने से पहले एनसीआर की हवा बिगड़ गई है। गर्मियों में वायुदाब कम रहने से विषाक्त कण ऊपर चले जाते हैं, किंतु सर्दियों में ओजोन, कार्बन मोनोऑक्साइड, एनओटू, एसओटू जैसी गैसें फेफड़ों में पहुंच रही हैं। ओजोन का प्रभाव इतना घातक है कि पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण कर भोजन नहीं बना पाते हैं। ऊतकों की मौत हो जाती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक हवा में पीएम-2.5, पीएम-10 के साथ ओजोन पर भी नजर रखना जरूरी है।

कहां क्या हालात

शहर का नाम                  हवा में ओजोन की मात्रा

मेरठ                             70

गाजियाबाद                    55

नई दिल्ली, अरविंदो मार्ग   44

नई दिल्ली, जहांगीरपुरी     18

नई दिल्ली आनंद विहार      06

मुजफ्फरनगर मंडी             40

बुलंदशहर                         48

नोएडा नालेज पार्क             48

नोएडा, सेक्टर-1                 30

नोएडा, सेक्टर-62               49

फरीदाबाद, सेक्टर-16          44

कानपुर                             12

बनारस                              18

नोट : आंकड़े माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर में हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

ओजोन गैस की मात्रा वायुमंडल में 80 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इस हवा में आठ घंटे गुजारने पर स्किन कैंसर से लेकर ब्रांकाइटिस व सांस की कई बीमारियां हो सकती हैं। वाहनों से निकलने वाली गैस धूप से रिएक्शन कर ओजोन बनाती हैं।

- डा. एके दूबे, पर्यावरण वैज्ञानिक, सीसीएसयू।

- ओजोन की मात्रा 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंचते ही सावधान हो जाना चाहिए। यह फेफड़ों में सूजन बनाने लगती है। बच्चों पर भी इसका ज्यादा घातक असर मिला है। सर्दियों में मौसम भारी होने से ये विषाक्त गैसें देर तक निचली परत में बनी रहती हैं।

- डा. राजकुमार, सीएमओ। 

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