हस्तिनापुर के टीले उगलेंगे इतिहास, एएसआइ की टीम ने डाला डेरा; खनन की तैयारी शुरू

विश्व के सबसे बड़े युद्ध यानी महाभारत के भुगोल एवं साक्ष्य को लेकर इतिहासविद गोते लगा रहे हैं। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण संस्थान ने हाल में बड़ी उम्मीदों के साथ हस्तिनापुर में डेरा डाला है। इतिहासविदों ने माना है कि हर टीले में इतिहास दफन है।

Himanshu DwivediWed, 21 Jul 2021 02:27 PM (IST)
इतिहासविदों ने माना है कि हर टीले में इतिहास दफन है।

जागरण संवाददाता, मेरठ। विश्व के सबसे बड़े युद्ध यानी महाभारत के भुगोल एवं साक्ष्य को लेकर इतिहासविद गोते लगा रहे हैं। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण संस्थान ने हाल में बड़ी उम्मीदों के साथ हस्तिनापुर में डेरा डाला है। इतिहासविदों ने माना है कि हर टीले में इतिहास दफन है। अधीक्षण पुरातत्वविद मेरठ मंडल डीबी गणनायक की अगुवाई में आधुनिक उपकरणों के जरिए यहां उत्खनन का पहला चरण शुरू कर दिया गया है। अमृतकूप के पास स्थित टीले में एक गोलाकार आकृति मिली है, जिसमें नए साक्ष्य मिल सकते हैं। पुरातत्व विभाग की टीम ने पांडव टीले में ट्रेंच से मिट्टी हटाई, जहां से कुछ बर्तन मिले हैं। प्राचीन दीवारों की सफाई कर नए सिरे से व्यापक स्तर पर चरणबद्ध तरीके से खनन की तैयारी की गई है। ट्रेंच लगा आधा दर्जन स्थान चिह्न्ति किए हैं। (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग) एएसआइ के संयुक्त निदेशक डा. संजय मंजुल और असिस्टेंट ज्वाइंट डायरेक्टर आरती ने बताया कि सितंबर के बाद हस्तिनापुर में उत्खनन का नया युग शुरू होगा। यहां सिनौली जैसे महाभारतकालीन साक्ष्य मिल सकते हैं।

सिनौली में मिले थे 5000 साल पुराने रथ

डा. अमित पाठक बताते हैं कि 2005 और 2018 में हस्तिनापुर से 80 किलोमीटर दूर बागपत के सिनौली में खनन कराया गया। यहां पर 116 शव दफन मिले, जो दुनिया में पहली बार देखे गए। यहीं पर करीब पांच हजार साल पुराना एक रथ मिला, जिसे महाभारत काल की ऐतिहासिकता का सबसे बड़ा साक्ष्य माना गया। एक ताबूत भी मिला, जिसकी एएसआइ अब तक पड़ताल कर रही है।

बूढ़ी गंगा में मिले थे महाभारतकालीन बर्तन

1950-51 में भारतीय पुरातत्व के पितामह प्रो. बीबी लाल ने हस्तिनापुर में एक टीले का उत्खनन किया। इस दौरान इतिहासकारों के बीच यह बहस छिड़ी कि क्या यह वही कौरव-पांडवों वाली हस्तिनापुर है? प्रो. बीबी लाल ने उत्खनन कराया, जहां से कांच और क्रिस्टल से बने रंगीन बर्तनों के टुकड़े मिले, जो करीब चार हजार वर्ष पुराने आंके गए। इतिहासकार डा. अमित पाठक कहते हैं कि ऐसे बर्तन दुनिया के किसी सभ्यता में पहली बार मिले। प्रो. बीबी लाल ने बूढ़ी गंगा में उत्खनन कराया और बोरवेल से यही बर्तन दोबारा मिले। इससे महाभारतकालीन विकसित सभ्यता की पुष्टि हो गई। बाद में यह सभ्यता गंगा की बाढ़ में बह गई थी।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

पहले हस्तिनापुर की एैतिहासिकता को लेकर प्रश्न खड़े किए गए थे, जिसे प्रो. बीबी लाल ने 1950-51 के खनन से दूर कर दिया। साबित हुआ कि यह पुराणों में वíणत वहीं हस्तिनापुर है। यहां हर टीले में अंदर इतिहास के नए पन्ने फड़फड़ा रहे हैं। सिनौली उत्खनन ने महाभारत को पूरी तरह स्थापित करते हुए इतिहास के कई पन्नों को भी बदल दिया। गंगा किनारे सभी टीमों का खनन कराएं, बहुत कुछ नया मिलेगा।

डा. अमित पाठक, इतिहासविद 

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